"picture " dirty हो या prity इनमे एक चीज की समानता हमेशा एक होती है -entertainment , entertainment ,और सिर्फ entertainment ...
सवाल यह है की चित्रपट हमेशा सिर्फ entertainment ही दे या फिर इसके भी कुछ दायरे हो,कुछ जिम्मेदारी हो |
दर्शक क्या करे ,entertain होकर चला आऐ या फिर इनमे कुछ पाए ,इनमे कुछ खोये |
रोकर या हँश कर चला आये ,या इस दौर में जब साधू का सत्संग नही है,(और अगर है भी तो वे धर्म के management guru बन कर रह गए है ),कुछ सीखे ,कुछ सोचने पर मजबूर हो ?
कभी न कभी, हर दौर में cinema ने हमें प्रेरित किया है ,पर क्या प्रेरणा का कुछ असर हुआ ??
अगर sunny गावस्कर को देख कोई tendulkar बन सकता है ,IPL नए लड़कों को अच्छा खेलने के लिए प्रेरित कर सकता है तो फिर film 's क्यों नही ???
क्यों नही "प्रेमग्रंथ " देख लोग विधवा पुनः विवाह को प्रेरित होते है ,क्यों rang de basanti नए क्रांति का बिगुल नही फूंक पाती?,क्यों munna की गांधीगिरी screen से बाहर नही निकल पाती ???
अगर gessikalal हत्याकांड पर बनी फिल्मे hit हो सकती है तो वे हमें प्रेरित क्यों नही कर पाती की इस तरह की वारदात हो ही ना पाए ????
मानविये सोच कभी भी किसी भी चीज से प्रभावित हो सकती है ,बशर्ते उसे व्यापक तौर पे ,गंभीरता और रचनात्मकता के साथ प्रस्तुत किया जाये |
बहुत दिनों बाद आज इसी सोच ने लिखने को मजबूर किया |
dirty picture उस कड़ी में एक नया अध्याय है|
यह हमारी सच्चाई और समाज के विषांगत सोच को प्रदर्शित करती एक कड़वी सच्चाई है परन्तु क्या हम इसकी एक भी घूंट पिने को तैयार है |
हमने "स्मिता " (जिसे हम सिल्क स्मिता के नाम से जानते है ) को नाचते देखा ,कामलोलुप नयनो और लपलपाती जीभ से उसके गदगदाए शरीर को घुड़ा(मनो आखो में x -ray लगा हो ),उसके अंगराई ने हमें मद-मस्त किया , उसने दांत भींचे और हमने यहाँ आंह ली | पर..
क्या हमने silk की स्मिता(इज्जत) पर नज़र दौराया ????
स्मिता को "silk " किसने बनाया ???
जहाँ नारियों को दुर्गा के रूप में पूजने का रिवाज है,जब माँ हमें बचाने राक्षसों पर वार करती नर-चंडी बनती हैं तो हम नयनाभिराम आराधना में लीन रहते हैं |
अपनी आँखे बंद किये संग्राम के अंत का इंतजार करते रहते है| उनके रौद्र रूप और स्त्री के चरित्र के विपरीत उनके आचरण और प्रहार पर नज़र भी नही दौराते ,बस गद-गद होते रहते है|
शायद इसी कारण हम नारियों को लिक से हट कर कुछ करते देख नहीं देख पते |
हम अपनी आँखे बंद किये है,ताकी नारी को कुछ अलग करते नही देख सकते |
इसी कट्टर मानसिकता ने "स्मिता " को silk का नाम दे दिया क्योकि हम उसे देवी तो बना नहीं सकते और उसके पुरुषवादी समाज को टक्कर देने की छमता ,रवैया और साहस को देख नही सकते |
सो बदनाम ही कर दो -ताकी देखने का अधिकार भी मिल जाये और नैतिकता की दुहाई भी दे सके |
पर क्या समाज को जो एक स्मिता की "स्मिता " की रक्षा नही कर सकता -नैतिकता का पाठ पढ़ाने का हक है? .अगर समाज समानता का अधिकार नही दे सकता तो क्या उसे किसी के लिए protocol बनाने का अधिकार है ???
क्या किसी ने चहकती ,खिलखिलाती silk में पड़े सिलवटों को देखा ...
गुलाबी गलों में ,समाज के नाखूनों के घावों को पहचानने की जेहमत उठाई ??????
नही...!!!!!!!!!!!!
किसी ने सिक्के उछाले ,किसी ने समाज में गंदगी फैलाने की तोहमत लगाया तो किसी ने film बना इसकी marketing की |
तो क्या हमें हक है की हम खुद की गन्दगी साफ किये बगैर ,समाज सुधार के थोथरे उपाय सुझाये ....
जरुरत है ,सोच के बदलने की ,सिर्फ oooo ,la ...la ...पर ठुमके लगाने की बजाये उनमे छुपे कराहों को सुने |
और यदि किसी ने कोशिश भी की तो इतनी देर ना करे की परिवर्तन और नई सोच की आँधी तब तक थम हाय |
जरूरत है आज उस महा "बलिदान " (भले उसमे अंधी सफलता का शूरूर ही क्यों ना हो )को स्राधांजलि देने की जिसने समाज के पशुता को बांध कर रखा वरना यह आग घर-घर में फ़ैल जाती और रंगमंच की कहानियां हमारे आँगन को मैला करने लगती |
उस मौन पर मजबूत बांध को सदर नमन जिसने सरिफो के पंजो के निशान खुद पर झेल ,समाज की दीवारों को महफूज रखा......
सवाल यह है की चित्रपट हमेशा सिर्फ entertainment ही दे या फिर इसके भी कुछ दायरे हो,कुछ जिम्मेदारी हो |
दर्शक क्या करे ,entertain होकर चला आऐ या फिर इनमे कुछ पाए ,इनमे कुछ खोये |
रोकर या हँश कर चला आये ,या इस दौर में जब साधू का सत्संग नही है,(और अगर है भी तो वे धर्म के management guru बन कर रह गए है ),कुछ सीखे ,कुछ सोचने पर मजबूर हो ?
कभी न कभी, हर दौर में cinema ने हमें प्रेरित किया है ,पर क्या प्रेरणा का कुछ असर हुआ ??
अगर sunny गावस्कर को देख कोई tendulkar बन सकता है ,IPL नए लड़कों को अच्छा खेलने के लिए प्रेरित कर सकता है तो फिर film 's क्यों नही ???
क्यों नही "प्रेमग्रंथ " देख लोग विधवा पुनः विवाह को प्रेरित होते है ,क्यों rang de basanti नए क्रांति का बिगुल नही फूंक पाती?,क्यों munna की गांधीगिरी screen से बाहर नही निकल पाती ???
अगर gessikalal हत्याकांड पर बनी फिल्मे hit हो सकती है तो वे हमें प्रेरित क्यों नही कर पाती की इस तरह की वारदात हो ही ना पाए ????
मानविये सोच कभी भी किसी भी चीज से प्रभावित हो सकती है ,बशर्ते उसे व्यापक तौर पे ,गंभीरता और रचनात्मकता के साथ प्रस्तुत किया जाये |
बहुत दिनों बाद आज इसी सोच ने लिखने को मजबूर किया |
dirty picture उस कड़ी में एक नया अध्याय है|
यह हमारी सच्चाई और समाज के विषांगत सोच को प्रदर्शित करती एक कड़वी सच्चाई है परन्तु क्या हम इसकी एक भी घूंट पिने को तैयार है |
हमने "स्मिता " (जिसे हम सिल्क स्मिता के नाम से जानते है ) को नाचते देखा ,कामलोलुप नयनो और लपलपाती जीभ से उसके गदगदाए शरीर को घुड़ा(मनो आखो में x -ray लगा हो ),उसके अंगराई ने हमें मद-मस्त किया , उसने दांत भींचे और हमने यहाँ आंह ली | पर..
क्या हमने silk की स्मिता(इज्जत) पर नज़र दौराया ????
स्मिता को "silk " किसने बनाया ???
जहाँ नारियों को दुर्गा के रूप में पूजने का रिवाज है,जब माँ हमें बचाने राक्षसों पर वार करती नर-चंडी बनती हैं तो हम नयनाभिराम आराधना में लीन रहते हैं |
अपनी आँखे बंद किये संग्राम के अंत का इंतजार करते रहते है| उनके रौद्र रूप और स्त्री के चरित्र के विपरीत उनके आचरण और प्रहार पर नज़र भी नही दौराते ,बस गद-गद होते रहते है|
शायद इसी कारण हम नारियों को लिक से हट कर कुछ करते देख नहीं देख पते |
हम अपनी आँखे बंद किये है,ताकी नारी को कुछ अलग करते नही देख सकते |
इसी कट्टर मानसिकता ने "स्मिता " को silk का नाम दे दिया क्योकि हम उसे देवी तो बना नहीं सकते और उसके पुरुषवादी समाज को टक्कर देने की छमता ,रवैया और साहस को देख नही सकते |
सो बदनाम ही कर दो -ताकी देखने का अधिकार भी मिल जाये और नैतिकता की दुहाई भी दे सके |
पर क्या समाज को जो एक स्मिता की "स्मिता " की रक्षा नही कर सकता -नैतिकता का पाठ पढ़ाने का हक है? .अगर समाज समानता का अधिकार नही दे सकता तो क्या उसे किसी के लिए protocol बनाने का अधिकार है ???
क्या किसी ने चहकती ,खिलखिलाती silk में पड़े सिलवटों को देखा ...
गुलाबी गलों में ,समाज के नाखूनों के घावों को पहचानने की जेहमत उठाई ??????
नही...!!!!!!!!!!!!
किसी ने सिक्के उछाले ,किसी ने समाज में गंदगी फैलाने की तोहमत लगाया तो किसी ने film बना इसकी marketing की |
तो क्या हमें हक है की हम खुद की गन्दगी साफ किये बगैर ,समाज सुधार के थोथरे उपाय सुझाये ....
जरुरत है ,सोच के बदलने की ,सिर्फ oooo ,la ...la ...पर ठुमके लगाने की बजाये उनमे छुपे कराहों को सुने |
और यदि किसी ने कोशिश भी की तो इतनी देर ना करे की परिवर्तन और नई सोच की आँधी तब तक थम हाय |
जरूरत है आज उस महा "बलिदान " (भले उसमे अंधी सफलता का शूरूर ही क्यों ना हो )को स्राधांजलि देने की जिसने समाज के पशुता को बांध कर रखा वरना यह आग घर-घर में फ़ैल जाती और रंगमंच की कहानियां हमारे आँगन को मैला करने लगती |
उस मौन पर मजबूत बांध को सदर नमन जिसने सरिफो के पंजो के निशान खुद पर झेल ,समाज की दीवारों को महफूज रखा......
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