Thursday, February 05, 2015

लोकतंत्र की टोपी

मानों भ्रम हो चला था की शायद नर मुण्डों का रंग बदल गया ,पहले तो बाल आच्छादित काले लगते थे आज क्या हुआ सफ़ेद,नारंगी,नीले,हरे यहाँ तक की तिरंगे भी लग रहे हैं.
धन्यवाद कानफोड़ू लाऊडस्पीकर का जिसने तन्द्रा तोड़ी ,तो ज्ञात हुआ की ये तो टोपियाँ हैं टोपियाँ....अपने अलौकिक लोकतंत्र की निशानी टोपियाँ ,जो स्वतंत्रता आंदोलन के समय निश्छल सफ़ेद थीं और आज कैसे कैसे रंग चढ़े हैं की मानों "रंगा सियार " लग रहे हों.सभी ओर अलग- अलग तंत्रो के माध्यम से आम लोगों पर मढ़े गए हैं..मानों 5 साल में इक बार आम जनों को नहला धुला कर "  राज्याभिषेक " किया जा रहा हो ...फिर  तो 5  साल काटना ही है..
इतना ही नही राज्याभिषेक के साथ जयघोष भी है..भले दबंगई ,गाली-गलौज से परिपूर्ण हो ...जो मानों लग रही हैं की 60 साल की बिफलता को ढकने की कोशिश है.
उद्घोषणाओ और घोषणापत्रों का " राजपत्र" भी सडको को पाटे हैं , कंक्रीट न सही घोषणाओं की " गुदड़ी" तो लकतांत्रिक विकास की इज्जत बचा रही हैं.घोषणा पत्र न हुआ बहाना  पत्र हो, की " पूर्ण राज्य " का दर्जा जो बुते का नहीं है फिर भी ताकि टकराव का बहाना मिले, मकान ...पर 2022 तक रुक जाने का बहाना ,wi -fi ..फिर सुरक्षा और गोपनीयता के नाम का बहाना,भ्रष्टाचार ...अरे हमारे अधिकार -क्षेत्र में नही ...लोगों के नियत में कैसे हम बदलाव करें ...बिजली -पानी ...शादियों का बहाना नए रूप में...सुरक्षा ...अधिकार-क्षेत्र में नही ,बजट भी काम है, हर आदमी के साथ तो पुलिस नही लगा सकते ना...कानून अपना काम करेगी का बहाना....या फिर इक नया कानून ...सब बहाने ..भागने के ..टकराव के...या मलाई खाने के..
फिर भी बिक रहे हैं  भाई निशिर्गकता से कहाँ काम चलता है ...दिखावा ही तो बिकता है..

गरीब खाए न खाये ..सपने "लाखों" पाने के तो देख ही सकता है ..
पानी आये ना आये ..लोकतंत्र के महापर्व पे "देशी" घूंट मर लरखड़ा कर अपना मत फेंक ही सकता है..
चलो कोई नही ये तो होना ही है ,पोलिटिकल साइंस की कक्षा बंक की होती तो शायद मन ना मानता ..अरस्तु पागल थोड़े था की लोकतंत्र को मूर्खों का शासन कह बैठा...वो क्या जनता था की हमारी तो अनोखी ..अलग.. " अति -लोकतंत्र" है..
खैर छोडो ..गांधी की टोपी फिर चढ़ी तो ..फिर चाहे "लोकतंत्र की टोपी " की तरह हो या " लोकतंत्र को टोपी " हो...
हमें क्या ...हम तो टोपी पहनने के आदि हैं ही...