चुनावी समर ही
कुछ ऐसा होता
है की ,ना
चाहते हुए भी
आप उसमें खिंच जाते हैं
,उसके बारे में
सोचने लगते हैं
और उस दंगल
का हिस्सा बन
बैठते है ..
कमोबेश मेरी भी
यहीं स्थिति 1000 km दूर होने
के बाद भी यही
है .
दिमाग इनसब से
दूर रहना चाहता
है पर दिल
न जाने कब
चुपके से निकल
अपने गृह प्रान्त
के गलियों में
विचरने लगता है
,नुक्कड़ की चर्चाओ
का हिस्सा बन
जाता है और
सम्भावनाओ ,आशाओं,और स्थितियों
का विश्लेषण में
रम जाता है
..
और प्रतिफल ..ये लेख
..जिसे न चाहते
हुए भी "भारी"
मन से लिख
रहा हूँ ..इसलिए
नही की मैं
किसी पक्ष के
हार या जीत
से अशांत हूँ
बल्कि इसलिए की
नहीं चाहता की
किसी भी पक्ष
की हार हो
....क्योकि हार तो
फिर भी बिहार
की ही होगी..
पिछले चुनावो का उल्लास
काफूर हो चूका
क्योकि जिस उम्मीदों
को उल्लास ने
वोट से खड़ा
किया था उनका
बिखराव ,"u -टर्न " हजम नही
हो पा रहा
..लग रहा है
नई शुरुआत तो
हुई ही नही
..हम फिर उसी
दो-राहे पर
खड़े हैं .
1996 के पहले के
जिस कुशल रणनीतिकार
और अल्प "जन-नेता " नितीश बाबू
को जब
"भाजपा" ने मुखौटा
बना जन नायक
के रूप में
पेश किया तो
भगवे का कवच
और सौहाद्र का
मेल था जिसने
दशकों से चली
आ रही जात-पात,अपराध
और अराजकता का
किला तोड़ दिया
.और विकास की
नयी गाथा शुरू
हुई ..
पर जो रथ
इस "जोड़ी " के सहारे
दौड़ी वो अब टूट
चुकी और उसका
एक पहिया उसी
दलदल में जा
फंशा जहाँ से
बिहार बड़ी मासक्त
से निकल पाया
था ..
और दूसरा विकास संग
"साम्प्रदायिकता "के दोहरे
नाव पर सवार
हो चला है
...
शायद यह बिहार
का दुर्भाग्य है
की जिस "इक
दूसरे को पूरा
करते -पूरक जोड़ी
को "(जिसमे एक ध्रुव
दूसरे के सांप्रदायिक
पक्ष पर लगाम कसता
था और उसे
भारतीय मूल्यों पर बनाये
रखता था तो
दूसरा अपराध ,टूट
और भष्टाचार (जोकि
जनता दाल का
इतिहास था )उसे
रोके रख विकास
को सुनिश्चित करता
था )वोट किया
था वो इक
दूसरे के सामने
खड़े हैं..
और दोनों ही विकास
छोड़ (जोकि उनकी
पहचान थी ) और
चीजो में उलझ
कर रह गए
हैं...विकास तो
हुआ लेकिन ये
ना नितीश बाबू
और ना बीजेपी
की अकेली की
देंन है वरन ये तो जोड़ी
का दम था..जहाँ विपरीत
विचारधाराओ ने ना
सिर्फ विकास की
नई इबारत लिखी
बल्कि एकता का
नया अध्याय भी
शुरू किया ..
पर अब क्या
बचा ...कुछ भी
तो नही ..ना
अब किसी को
कोई अंकुश में
रखेगा और ना
कोई एकता समाज
में नज़र आएगी ....अब बस बारी है कुतर्कों
,अवांछित वक्तब्यों और ओछी राजनीती की झमझम बारिश की जिसमे "सुसाशन"धूल कर
जंगल राज हो जाना है और विकास पथ धर्मांध प्रचार की ओर बढ़ जाना है ......
और ये सब किस नाम पर
-सिद्धांत ...जो गोधरा के समय सोया था जब बाकि साथ छोड़ रहे थे (पासवान जी विशेषतः
) और जब सर्वोच्च न्यायलय ने क्लीन चिट दे दी तो अचानक जग उठा और बिहार को बीच मझधार
में लेकर पटक दिया ..
तो क्या ये सिद्धांत
है या सिर्फ कोरी महत्वाकांक्षा ....
खैर जो भी हो
"बिहार " निश्चित ही हारेगा और अगर नही भी हरा तो पिछड़ तो जाएगा ही क्योकि
क्रिकेट हो या देश जोड़ी जल्दी बन कर टिकना
मुश्किल होता है ...पर इस दौर में भी सुस्त होना तो ठीक है पर पुनः मुड़ जाना और आरम्भ
पर फिर से पहुँच जाना तो नही ही चाहेगा ... नयी शुरुआत अच्छी नही और वो भी उस हालात
में जब उस काले दौर का साया साथ रहे तो और भी मुश्किल है ..रही बात साम्प्रदायिकता की तो
भारत में इससे लड़ने और बीजेपी को नकेल में रखने वाले की कमी थोड़े है (पासवान ,माझी
,कुशवाहा )पहले भी कर चुके आगे भी करेंगे पर
..जंगल राज तो बराबर टक्कर देगा और वर्तमान रवैया तो बदत्तर होने की ओर ही संकेत दे
रहा है (भाषण सुनिए लौलु जी का ..फिर से लालटेन दौर ..लठैत की तरह बोलने का दौर ,
IIT नही भैस पटकेगा की नही की बातें,matematical
equation नही जाति समीकरण(माई,अगड़ा पिछड़ा )की बातें ...और न जाने कितनी "दुत्त्त
" वाली बातें )...
कल जो भी हो पर
"पुनःः मुस्को भवः " भीषण अवस्था होगी ...सुशासन बाबू और इसमें हर कोई बाबू को ही चुनेगा पर यदि दोनों
एक ही हो तो...
क्या बिहार व्यक्ति
क भरोसे अपना वर्तमान या भविष्य दाव पर लगा भूत को गले लगाएगा ...
देखते हैं बिहार क्या
सोचता है..