थार की गरम हवाओं से थी,जब दिल्ली अकुलाई;
गरम घटाओं से इक जानी-पहचानी खुशबू भी आई;
लौटते पन्छी की कोलाहल कुछ कहती आई;
समझ परे था सब कुछ,फिर भी अपनेपन का ऐहसास दिलाई;
चाह लिए उस ऐहसास की तलाश मे ;
उड़ा मन का पंछी फिर आकाश मे;
लौटने पर था,कोई अपना साथ;
छूटे थे सदियो पहले जो हाथ;
मिल आऐ लिए अमन की आश|
शीश चिर गिरिराज का,
जब थी सिंधु लहराई;
बाँह फैलाए आलिंगन को,
माँ दौड़ती नज़र है आई;
रावी-चिनाब संग सिंधु मिलन को,
पाक भूमी पर प्रयाग स्मारित हो आई;
बिछूडे है,फिर भी है पास-पास,
कभी प्यार था,तनिक रार अभी,
पर झगडो से ही तो बढ़ता प्यार सही;
मिल बैठेंगे फिर इक दिन,सर्त रही;
अमन की है बस आश यही;
अमन की है बस आश यही;
गरम घटाओं से इक जानी-पहचानी खुशबू भी आई;
लौटते पन्छी की कोलाहल कुछ कहती आई;
समझ परे था सब कुछ,फिर भी अपनेपन का ऐहसास दिलाई;
चाह लिए उस ऐहसास की तलाश मे ;
उड़ा मन का पंछी फिर आकाश मे;
लौटने पर था,कोई अपना साथ;
छूटे थे सदियो पहले जो हाथ;
मिल आऐ लिए अमन की आश|
शीश चिर गिरिराज का,
जब थी सिंधु लहराई;
बाँह फैलाए आलिंगन को,
माँ दौड़ती नज़र है आई;
रावी-चिनाब संग सिंधु मिलन को,
पाक भूमी पर प्रयाग स्मारित हो आई;
बिछूडे है,फिर भी है पास-पास,
कभी प्यार था,तनिक रार अभी,
पर झगडो से ही तो बढ़ता प्यार सही;
मिल बैठेंगे फिर इक दिन,सर्त रही;
अमन की है बस आश यही;
अमन की है बस आश यही;