तमाम महिषी जिन्होंने अपना सर्वश्व अपने आराध्या को अर्पित कर दिया ,इन दिनों फ्रस्टियाए हैं ...........
सभी नए "भक्तों " के उदय से ,उनके चहुंओर चर्चा से अपने स्थान को खोजने में लगे हैं , सोच में पड़े हैं की क्या इन भक्तों का भगवान इतना शक्तिशाली है की जिसने सब को पीछे छोड़ दिया है |
कुछ टीस सोशल मीडिया ,इंटरनेट और फ्रीडम ऑफ़ स्पीच के उनके वक़्त न होने पर भी हो सकता है जिसने इन नव भक्तों को इतना नाम और बदनामी दिया है ,अंततः टॉप ट्रेडिंग में बनाये रखा है ...
पर सबसे बड़ा श्रेय तो जाता है इनके भगवान को जो लोकप्रियता और नफ़रत दोनों से लगातार चर्चा के शीर्ष पर विराजमान है ,जिसने संपूर्ण भारत को दो ध्रुवों में बाँट दिया है ...एक इसके आलोचक हैं और दूसरा इसके प्रशंसक (वैसे भगवान की महिमा इतनी विशाल है की अगर आप उनकी पार्टी ,देश की नीति या फिर सरकार के भी काम से खुश हैं या इत्तेफ़ाक़ रखते हैं तो आप भक्त की टोली में हैं या नही तो जबर्दस्ती दूसरे पक्ष द्वारा उसमे धकेल दिए जा सकते हैं )
मनो पूरा माहौल "देव मोदी " मय हो ..pro -मोदी या anti -मोदी.
आम आदमी को गुटनिरपेक्षता का कोई विकल्प ही नही मिल रहा ...अगर कोई कोशिश कर भी रहा तो "धकेल" अथवा "धकिया "लिया जा रहा है..
मैं नही जानता की गाँधी, नेहरू , आंबेडकर ,इंदिरा या अटल यहाँ तक की हिटलर , स्टालिन,या सद्दाम का भी इसी तरह का जन-समर्थन या विपथन था या नहीं..पर इतना जरूर बता सकता हूँ की "भक्त" कभी नहीं हुआ |
तो क्या मोदी साहब पार्टी ,विचारधारा ,नीतियों , देश सब से ऊपर हो चले हैं ...पता नही ..ये तो भक्त और आलोचक ही बता पायेंगे......
बात जो भी हो...
पर बड़े करीने से भक्त उभड़े हैं या उभाड़े गए हैं (चाहे वो उपहास या आलोचना के लिए ही क्यों न हो )
फलतः नेताओं ,अभिनेताओं ,यहाँ तक की कई निर्विकार संतों,लेखकों ,कवियों को जरूर ईर्ष्या में जला रहें है ...हाँ भक्त जरूर उल्लाशीत और आत्म-मुग्धा हैं ...पर आम भारतीय इस तरह के सांचे में खुद को नहीं चाहता है|
खैर ,क्या करें , विविध भारत में भिन्न मत अब असहिष्णुता ,सेक्युलर ,या भक्त के नाम हो चले हैं ...Ravi Kashyap