Monday, April 21, 2014

OHHH YE CHUNAV...

ये चुनाव कई फूल मुरझाएगा;
वतन की टहनियाँ काट कर ही मानेगा;
इकरंगी पत्तियों को भी झंडों के रंग लगाएगा;
बित भले जाए,पर कड़वाहट घोल ये जाएगा
              एक-दूसरे की खींचने मे लगे,देश रौंद कर जाएँगे;
              ये रंग मेरा-वो तुम्हारा करते-करते,किंचित भारत बेरंग कर जाएँगे;
            इसकी टोपी-उसकी टोपी के झाले मे,हमरी पगड़ी उछालेंगे;
            बीत भले ये जाए,विभाजन-बूँ फैला कर ही जाएँगे;
कभी शवों के दम लगाते,कभी घड़ियाली आंशु बहाते,"साले" हमे डूबा जाएँगे;
"तेरा","मेरा" के वंचन में,"हम" को चौराहे पे लाकर ये निरीह छोर जाएँगे;
जहर उगलते-उगलते,भारत ज़हरीला किए बिना ये ना मानेंगे;
ओह्ह्ह्ह!!! ये चुनाव बीतता क्यों नही,अब क्या हमे नोंक-नोंच खाएँगे.