Tuesday, January 21, 2014

aawara galiyon ke raja.

किनके हैं ये बच्चे;
किसका उनपर हाथ;
आवारे,गलियों के राजा;
क्या ढूँढे हैं,कचरों;
क्यों, फिरते हैं सड़को पे सारी-सारी रात.

आख़िर क्या चाहते हैं "आप"


एक मुख्यमंत्री धरने पर,बड़ा धमाका,बड़ी-बड़ी चर्चाए;
 आदमी का मुख्यमंत्री,एक SHO के  निलंबन के लिए अपनी सत्ता दाव पर लगा रहा है!!!!!
भ्रष्टाचार के लिए इतनी बरी लड़ाई...
कितनी आकर्षक हैं ये लाइने...
सिविल परीक्षा तैयारी के मध्य भारतीय प्रशासन और संविधान पढ़ते-पढ़ते,अचानक रुक कर मैं लिखने क्यों बैठ गया???
संविधान निर्माण,प्रशासन ,उसकी कार्यप्रणाली ,संरचना,संविधानिक आदर्श ओर आस्था के अल्प ज्ञान ने ऐतराज जताने और कलाम उठाने पर मजबूर किया.
क्या जनतंत्र का मतलब ये है,क्या सड़क पर से नीतिगत फ़ैसले लोकतंत्र को मजबूत करेन्गि. भारत की विशालता इसे अप्रत्यछ लोकतंत्र बनती है यहाँ जनप्रतिनिधि द्वार शासन होता है ना की चौपाल लगा कर (स्विट्ज़रलैंड की तरह).
भ्रष्टाचार या कोई अन्य नीतिगत फ़ैसले तार्किक चर्चा,गहनशोध उपरांत संवैधानिक दायरे मे रहकर विधानसभा पूरी प्रक्रिया को अनुकरण कर किया जाता है ताकि कोई भूल ना हो ओर प्रशासन कुशलता से चले,देश का संघीए ढाँचा बना रहे.
क्या ये ग़लत है,तो फिर क्यों नही "दिल्ली पुलिस" के तथाकथित "अधिग्रहण" के लिए विधान सभा मे एक बिल पास किया गया...
कम से कम एक चिट्ठी ही लिख देते..
प्रक्रिया से इतना परहेज क्यों..
"ऐन्ग्री यनमैन" वाला इमेज बनाने की इतनी जल्दी क्यो,प्रशासन क खिलाफ इतना विष क्यो..
लोक-प्रशासन का बहुआयामी और बहुस्तरीय होना ही नीति निर्माण की खामी को कम करता है..कोई उत्तेजक "जनमत सर्वेक्षण" नही..हा ये उसका इक अंग ही सकता है
तो क्या अब शोध न्ही होंगे,विचार नही होगा,नियम क़ानून की प्रक्रिया का पालन नही होगा..सिर्फ़ " जनमत सर्वेक्षण" ही लोकतंत्र को मजबूती देगा क्योकि अब हमे विशिष्टता की ज़रूरत न्ही,मात्र "झुंड",प्रशिक्षिणहीन ओर तत्कालिक लाभों से ग्रस्त लोग नीति निर्माण करेंगे.
कम से कम संविधान तो ऐसे "सर्वेक्षण" को न्ही मनती(इक बार भी चर्चा न्ही है संविधान मे)
एक मशीनरी को कुशलतापूर्वक चलना,प्रक्रिया का पालन कर अपने हक़ मे फ़ैसला करवाना ही लीडरशिप है,"दबाब "की राजनीति,चक्का जाम करना मात्र ह्ठ ही है.
इससे "आप" मे ओर अलगाववादियों मे क्या अंतर रह जाता है,वे संविधान को नही मानते सो उनका तो तर्क बनता है ऐसा करने पर परंतु आप तो संविधान को मानने की बात करते हो,तो फिर उसके आदर्शो और मूल्यों पर अपने सोच को थोपने की कोशिश क्यो,इस प्रकार का दोहरा चरित्र क्यो...या तो अलगाववादियों की तरह स्पष्ट यूद्ध करो
ये छ्द्म्म युद्ध नही चलेगा.
आज पुलिस के लिए हठी मार्ग,कल वितीय स्वतंत्रता क लिय. परसो स्वायतता क लिए.
इस तरह तो संघ ही छिन्न-भिन्न हो जायगा.
अत: सोचें,मात्र भीड़ का हिस्सा ना बने,भारत को फिर ५६२ टुकड़ों मे बाँटने की कोशिश मे भूल कर भी हिस्सा ना बने..ग़लत सोच या परम्परा को स्थापित ना करे,
संविधान निर्माता मूर्ख नही थे,उनकी सोंच को समझे..सिर्फ़ अपना या तत्कालिक लाभ पर द्‍यान मत दे..
भारत की अखण्डता बनाए रखें.