Monday, August 31, 2015

मैं महानतम -पर चाहिए आरक्षण

तलवार चमकाता ,बन्दुक कंधे पे डाले,चेतावनी और धमकी भरा लहजा और हिंसा पर उतारू भीड़ -ये हैं नए प्रगति करते भारत  के पिछड़े ,दबे -कुचले और हाशिये पर डाल दिए गए लोग ,जो रणभेदी जयघोषों से "आरक्षण"की अनुकृपा मांग रहे है ,मानो हक़ की लड़ाई हो बल्कि अपनी शक्ति से ,बिना किसी बात - विचार ,मंथन  के , छीन लेने पर उतारू हों.
ये सिर्फ हमारे "लोकतंत्र" (अति -लोकतंत्र )में ही संभव है जहाँ कारण-परिणाम ,मांग की वास्तविकता ,व्वहारिकता पर विचार किये बिना , उसके करक - कर्ता और तुच्छ सवार्थ की बलि चढ़ जाता है,………
महानता और दीनता कभी साखी नही हो सकती और ही बैभव और दरिद्र एक-दूसरे के साथ ,पर शायद यह काली-काल के काल-चक्र की ही बिडम्बना है की महानता ,विशालता ,बैभव ,शौर्य और शक्ति का बखान और प्रदर्शन ,शक्ति ,सामर्थ्य और संख्या की धौंस देते ,बन्दुक लहराते ,तलवार चमकाते कोई याचक ,अभ्यर्थी "आरक्षण" की मांग करेंगे .(जोकि शोषितों ,वंचितों,और पिछड़ों के लिए परिकल्पित की गयी है ).
जब मंडल आयोग संपूर्ण भारत को माप कर शोषितों ,पिछड़ों और वंचितों की सूचि तैयार की (उस समय भी ये महारथी लोग इतने ससक्त थे की प्रथम गृह-मंत्री उनकी ओर से हुआ वो भी तब जब अन्य वर्गों का प्रतिनिधि भी नगण्य था फलतः मंडल आयोग ने उन्हें उस सूचि में रखने लायक नही समझा...आज तो खैर समृद्धि का पैमाना की कुछ ओर है ) और B .P SINGH  साहब ने उन्हें हक़ दिया
तो लगा जैसे  सदियों से उपेक्षित ओर शोषित वर्ग को समानता ओर सुदृढ़ता मिलेगी जिससे उनका सामाजिक स्तर ऊँच होने के साथ- साथ उनमे हीन-भाव का विलोप  होगा ओर आत्मविश्वास प्रस्फुटित होगा फलतः शोषण के जख्म भरेंगे और भारत सबके सहयोग और सामर्थ्य के बल पर आगे बढ़ेगा और कमोबेश ऐसा हुआ भी |(सभी वर्ग के लोग आगे बढे पर शायद इन महारथियों की  गंगा  उल्टी बह  चली ).
शायद ही किसी ने कभी सोचा हो की इस "कृपा",और अनुकम्पा या यो कहों '"सहारे" की भी marketing होगी और उच्च वर्गीय और संसाधन युक्त (जो आज भी ससक्त हैं और उसका दंभ भी भर रहे हैं ) आरक्षण की मांग करेंगे |
गांधी की भूमि पर कर्म-योग और संघर्ष की जगह इस "जुगाड़"की इच्छा से सफल होने की  मंशा पाले जन-मानस का जन्म कैसे हुआ|
जिस बूढ़े ने हमें संसाधन-विहीन रहते हुए लड़ना ,जितना और जीतकर भी शांत रहना सिखाया  उसके  जन्मभूमि पर संसाधन संपन्न ,राजनितिक ,आर्थिक रूप से मजबूत "कर्मा और संघर्ष से भागने वालों "और "खैरात"की चाह लिए जन-मानस का जन्म किसी आश्चर्य से काम नही .
आजादी के 67 साल बाद तो लगभग हर वर्ग का विकास कम-ज्यादा जरूर और आप तो पहले से समृद्ध हो (170 संसद ,मुख्या-मंत्री और जाने क्या-क्या )...तो फिर "सहारे" की क्या जरूरत ...
या फिर कोई "झोल" है ,शायद विगत साल हुए उच्च आदर्शी आंदोलनों में छिपी राजनितिक महत्वकांछाओ की तरह|(जो की आपके आदर्श है तो कृपया अपने लाभ हेतु लोगों की जान का तो सौदा ना करें )
या ये भी हो सकता है की लड़ने का माद्दा ख़त्म हो गया (लेकिन व्यक्तिगत रूप से आप की हो भी गयी हो (हार्दिक) पर गुजराती लोग तो ऐसे नही )
या फिर चीड़ है पिछड़ों की तरक्की से की उनका हक़ छीन कर ना सिर्फ उनको फिर गर्त में भेजने की फ़िराक में है या समाज में कटुता घोलने की साजिश )..
वैसे अच्छा तरीका है गांधी ,पटेल और अन्ना के नाम पर खुद की पैठ बिठाने का और आज कल तो फैशन भी है ....और बहुत सुशासन बाबू ,विकाश बाबू ,भ्रष्टाचारी दस्त नमक छद्म आवरण लिए लोग आपको सहयोग लिए आतुर भी है ..इनकी तो राजनीती ही मंडल और आरक्षण के नाम पर फैली नफरत का फल है और वो समय की मांग को जाने बिना अभी भी वही टिके बैठे हैं ..
काश आप उस आंदोलन से आते या कम से कम पैरोकार ही होते जो आरक्षण-विहीन समाज की बात करता या फिर उस वर्ग से जो ये कहता की हम ससक्त हो चुके  (यादव और कुर्मी जैसे ,,) हमें आरक्षण से बहार निकल दो ....पर ये नैतिकता आज के दौर में कहाँ ...वैसे भी मलाई कौन छोड़ना चाहता ,,,महात्मा के देश में सब महात्मा थोड़े होते हैं...


...चलो अच्छा है ..आया और इक नया नेता ..
देश को जन ,जनादेश ,विकास की जरूरत थोड़े है ....ये सब तो बहुत है बस नेता की कमी है....
आइये आपका भी स्वागत है...