आहा ,आज सज-धज कर बैठा,अपने शानो-शौकत पर इतरता,सीना फुलाए मैं(india gate)आत्ममुग्ध उस महान बेला,लोकतंत्र की परेड जिसमे 63 साल का भारत,उसकी उपलब्धि ,संस्कृति प्रदर्शित होगी,हमने 63साल में क्या पाया इसका आईना देखने हेतु उतावला राजपथ की ओर ताक रहा हूँ.
रुकिये-रुकिये,आवाज़ें आ रहीं हैं,लगता है झंडोत्तोलन हो रहा है और महामहिम भारतीय संपन्नता,संतोष ,शांति और ना जाने किस-2 बड़ाईयों का वर्णन कर रहे हैं.
पर ये क्या देख रहा हूँ-
इस सर्द मौसम मे झंडा इतनी ज़ोर से क्यों फहरा रहा,हवाएँ तो इतनी तेज नहीं....अरे ये तो इसे लेकर हिलाते हुए चला आ रहा,कौन है..महामहिम तो ऐसे नही आते!!!
ये कोलाहल कैसा????
ये भारत सरकार को कोसने के नारे "आज" कौन लगा रहा..इतनी भीड़ व्यवस्था परिवर्तन की माँग ,भ्रष्टाचार और असंतोष का.
ओह मैं शायद कहीं खो गया हूँ.....खैर,छोड़ो,अब आ रहीं है,भारतीय संपन्नता,शक्ति के प्रतीक मिसाइलें,GSLV,अत्याधुनिक यंत्रो की प्रदर्शनी.....लेकिन,ऐसे,ये क्या मिसाइलों के स्थान पर सुखी हैंडपम्प,GSLV की जगह टूटा-फूटा प्राथमिक चिकित्सालय,आधुनिक यंत्रो क जगह पर ये नर-कंकालों की भीड़.
ओहह...क्या हो गया है मुझे...शायद मेरा भ्रम है.....
अब राज्यों की संस्कृति और सभ्यता की झाकियों की बरी है...ये आ रहीं है....आई...आई..ये देखो..
क्या..मैं मराठी..तू बिहारी..तुम हिंदू..मैं मुसमान...ये सब किस सभ्यता की झाकी मुझे दिख रही है...भाईचारा और समानता के प्रतीक ह्मारे राज्यों की झाँकी को क्या हो गया..ये क्या है..
भाषाई,जातीए और समुदाय को कब से प्रदर्शित किया जाने लगा....ओहहह..ये "बसुधैव कुटुम्बकम"की जगह सांप्रदायिकता मे जले ये मकान क्यो,प्रतीक स्वरूप दिखाई दे रहें हैं..
ये नही हो सकता...ये तो पुरानी दीनो की बात थी..अब तो हम विकसित हो चलें हैं...सबकुछ ठीक है..ये 21वीं सदी है..इसमे ये सब कहाँ..
मैं भी ना पुरानी बातों मे जी रहा हूँ..असमान..अभवाग्रस्त..बँटा हुआ..गुलाम भारत को देखने लगा हूँ..अब तो "भारत का निर्माण" हो रहा है..."इंडिया साइन" कर रही है..ये रंग-बिरंगी लाइटें,मेरी चारों ओर लगे ये झालर,ये साफ-सफाई..ये मेरे आँगन के फव्वारे न्ही देख रहे..और इसी की प्रतिबिंब रूपी ये आ रहीं हैं बच्चो की टोली...समानता को दिखाती तीन रंगों मे रंगी...
पर,ये मटमैलें कैसे हो गये...गिर गये कहीं क्या...नही. नहीं..राजपथ तो अंतराष्ट्रिए स्तर का है..
अरे ये नज़दीक आ गये........ओह इन्हें तो मैं जनता हूँ...
हे राम ये तो...ये तो वहीं बच्चे हैं जो मेरी ही चारों ओर के फुतपाथ पर सोते है,कूड़ा बीनते है..असमानता के शिकार..अस्पृश्य...
ओह छोड़ो नहीं देखना मुझे कोई परेड..जिस संविधान के लागू होने ,गणतंत्र का इतना बड़ा महोत्सव..उस गणतंत्र के उदेश्यों के विपरीत दृश्यों को साल भर देख-देख आज इस आयोजन मे भी मुझे वही सब नज़र आ रहा है...मान होता है आँखें मूंद लूँ..पर अपने पत्थरों पर जमे शहीदों के नाम मुझे ..सिने पर पत्थर रखने को मजबूर कर रहे है....मई तो बस अब विरासत ही हू बस...अब लगता है इन पत्थरों से आंशु निकल आएँगे.....
इस 63 साल मे हमने तंत्र तो बहुत खड़े कर लिए..सुरक्षातंत्र,सूचनतंत्र,प्रशसंतंत्र...और ना जाने क्या-क्या..पर इन सब के बीच ना जाने कब "गण" कब पीछे रह गये...
ये क्या इतनी रौशनी अचानक...अब क्या हुआ....परेड मे "सूर्य "...अरे नही..ये तो सुबह हुई है...तो मई सपना देख रहा था...26 जनवरी आज है...हा हा हा..
अब परेड होगी...पर अब वो उत्सुकता..वो जोश..वो खुशी न्ही महसूस हो रही...शायद इस जनतंत्र मे मात्र "इठलाहट" और "आत्ममुग्धता" दिख पड़ती है...जनतंत्र नहीं...
क्या आपको भी कुछ ऐसा ही लग रहा है...खैर चलिए...जय हिंद....