Sunday, May 04, 2014

ab to jago...

ज़मीं लहू- नद से भाड़ा है,
चीत्कारों से दिशा-दस कोश शमा उजड़ा है,
अब तो जागो ,ऐ गद्दी के गिद्धों ,
देखों,चहुओर अपनों का शवकर्पट बिखड़ा है,
 चलो,शुरू हो जाओ,बोली लगाओ,
 देखो,तुम्हारे लिए भोजन बिखड़ा है,
 चुन-चुन कर गिनती करते जाओ,
 क्रदन स्वर को भाषनो से दबाओ,
  और राहत का माल जाम कर खाओ
                           अब तो जागो ऐ नेता मेरे,
                        देखो हम पर क़हर ओर तुम पे मौला का क़रम बर्षा है...
                    

Monday, April 21, 2014

OHHH YE CHUNAV...

ये चुनाव कई फूल मुरझाएगा;
वतन की टहनियाँ काट कर ही मानेगा;
इकरंगी पत्तियों को भी झंडों के रंग लगाएगा;
बित भले जाए,पर कड़वाहट घोल ये जाएगा
              एक-दूसरे की खींचने मे लगे,देश रौंद कर जाएँगे;
              ये रंग मेरा-वो तुम्हारा करते-करते,किंचित भारत बेरंग कर जाएँगे;
            इसकी टोपी-उसकी टोपी के झाले मे,हमरी पगड़ी उछालेंगे;
            बीत भले ये जाए,विभाजन-बूँ फैला कर ही जाएँगे;
कभी शवों के दम लगाते,कभी घड़ियाली आंशु बहाते,"साले" हमे डूबा जाएँगे;
"तेरा","मेरा" के वंचन में,"हम" को चौराहे पे लाकर ये निरीह छोर जाएँगे;
जहर उगलते-उगलते,भारत ज़हरीला किए बिना ये ना मानेंगे;
ओह्ह्ह्ह!!! ये चुनाव बीतता क्यों नही,अब क्या हमे नोंक-नोंच खाएँगे.

Saturday, January 25, 2014

63-लोकतंत्र परेड की कहानी-India gate की ज़ुबानी.


 आहा ,आज सज-धज कर बैठा,अपने शानो-शौकत पर इतरता,सीना फुलाए मैं(india gate)आत्ममुग्ध उस महान बेला,लोकतंत्र की परेड जिसमे 63 साल का भारत,उसकी उपलब्धि ,संस्कृति प्रदर्शित होगी,हमने 63साल में क्या पाया इसका आईना देखने हेतु उतावला राजपथ की ओर ताक रहा हूँ.
रुकिये-रुकिये,आवाज़ें आ रहीं हैं,लगता है झंडोत्तोलन हो रहा है और महामहिम भारतीय संपन्नता,संतोष ,शांति और ना जाने किस-2 बड़ाईयों का वर्णन कर रहे हैं.
पर ये क्या देख  रहा हूँ-
इस सर्द मौसम मे झंडा इतनी ज़ोर से क्यों फहरा रहा,हवाएँ तो इतनी तेज नहीं....अरे ये तो इसे लेकर हिलाते हुए चला आ रहा,कौन है..महामहिम तो ऐसे नही आते!!!
ये कोलाहल कैसा????
ये भारत सरकार को कोसने के नारे "आज" कौन लगा रहा..इतनी भीड़ व्यवस्था परिवर्तन की माँग ,भ्रष्टाचार और असंतोष  का.
ओह मैं शायद कहीं खो गया हूँ.....खैर,छोड़ो,अब आ रहीं है,भारतीय संपन्नता,शक्ति के प्रतीक मिसाइलें,GSLV,अत्याधुनिक यंत्रो की प्रदर्शनी.....लेकिन,ऐसे,ये क्या मिसाइलों के स्थान पर सुखी हैंडपम्प,GSLV की जगह टूटा-फूटा प्राथमिक चिकित्सालय,आधुनिक यंत्रो क जगह पर ये नर-कंकालों की भीड़.
ओहह...क्या हो गया है मुझे...शायद मेरा भ्रम है.....
अब राज्यों की संस्कृति और सभ्यता की झाकियों की बरी है...ये आ रहीं है....आई...आई..ये देखो..
क्या..मैं मराठी..तू बिहारी..तुम हिंदू..मैं मुसमान...ये सब किस सभ्यता की झाकी मुझे दिख रही है...भाईचारा और समानता के प्रतीक ह्मारे राज्यों की झाँकी को क्या हो गया..ये क्या है..
भाषाई,जातीए और समुदाय को कब से प्रदर्शित किया जाने लगा....ओहहह..ये "बसुधैव कुटुम्बकम"की जगह सांप्रदायिकता मे जले ये मकान क्यो,प्रतीक स्वरूप दिखाई दे रहें हैं..
ये नही हो सकता...ये तो पुरानी दीनो की बात थी..अब तो हम विकसित हो चलें हैं...सबकुछ ठीक है..ये 21वीं सदी है..इसमे ये सब कहाँ..
मैं भी ना पुरानी बातों मे जी रहा हूँ..असमान..अभवाग्रस्त..बँटा हुआ..गुलाम भारत को देखने लगा हूँ..अब तो "भारत का निर्माण" हो रहा है..."इंडिया साइन" कर रही है..ये रंग-बिरंगी लाइटें,मेरी चारों ओर लगे ये झालर,ये साफ-सफाई..ये मेरे आँगन के फव्वारे  न्ही देख रहे..और इसी की प्रतिबिंब रूपी ये आ रहीं हैं बच्चो की टोली...समानता को दिखाती तीन रंगों मे रंगी...
पर,ये मटमैलें कैसे हो गये...गिर गये कहीं क्या...नही. नहीं..राजपथ तो अंतराष्ट्रिए स्तर का है..
अरे ये नज़दीक आ गये........ओह इन्हें तो मैं जनता हूँ...
हे राम ये तो...ये तो वहीं बच्चे हैं जो मेरी ही चारों ओर के फुतपाथ पर सोते है,कूड़ा बीनते है..असमानता के शिकार..अस्पृश्य...
ओह छोड़ो नहीं देखना मुझे कोई परेड..जिस संविधान के लागू होने ,गणतंत्र का इतना बड़ा महोत्सव..उस गणतंत्र के उदेश्यों के विपरीत दृश्यों को साल भर देख-देख आज इस आयोजन मे भी मुझे वही सब नज़र आ रहा है...मान होता है आँखें मूंद लूँ..पर अपने पत्थरों पर जमे शहीदों के नाम मुझे ..सिने पर पत्थर रखने को मजबूर कर रहे है....मई तो बस अब विरासत ही हू बस...अब लगता है इन पत्थरों से आंशु निकल आएँगे.....
इस 63 साल मे हमने तंत्र तो बहुत खड़े कर लिए..सुरक्षातंत्र,सूचनतंत्र,प्रशसंतंत्र...और ना जाने क्या-क्या..पर इन सब के बीच ना जाने कब "गण" कब पीछे रह गये...
ये क्या इतनी रौशनी अचानक...अब क्या हुआ....परेड मे "सूर्य "...अरे नही..ये तो सुबह हुई है...तो मई सपना देख रहा था...26 जनवरी आज है...हा हा हा..
अब परेड होगी...पर अब वो उत्सुकता..वो जोश..वो खुशी न्ही महसूस हो रही...शायद इस जनतंत्र मे मात्र "इठलाहट" और "आत्ममुग्धता" दिख पड़ती है...जनतंत्र नहीं...
क्या आपको भी कुछ ऐसा ही लग रहा है...खैर चलिए...जय हिंद....

Wednesday, January 22, 2014

दया याचिका -मानवता या अन्याय



कल की ऐतिहासिक निर्णय द्वारा sc ने 15  लोगों के फाँसी की सज़ा को उम्र क़ैद मे बदल दिया|
 अब प्रश्न यह है की क्या यह एक उदाहरणीये कदम है या उन नि:अपराध लोगों के साथ अन्याय जो उनके द्वारा समयपूर्व काल के गाल मे समा दिए गये.
इन तमाम वाद-विवादों मे पड़ने से पहले हमे चाहिए की हम क्षमादान को समझे ,उसके उदेश्यों को समझे ओर किस तरह दी जाती है उसे जाने ,तो खुद-ब-खुद सारी दुविधा दूर हो जाएगी.
जब किसी को फाँसी दी जाती तो मात्र किसी को मार देना ही काफ़ी नहीं होता,अपराध अगर RAREST OR RARE  हो,अपराधी विभस्त अपराध करने के बाबजूद शर्मिंदा ना हो या अपराध मानवता को शर्मिंदा करनेवाला हो(ipc302) तभी दी जा सकती है.
तो फिर क्षमादान क्यो?
इसका उत्तर हमे अपने संविधान मे मिलता है article-72,article-161 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपाल को क्षमादान का अधिकार प्रदान करता है.परन्तु मृत्युदंड के क्षमादान की शक्ति मात्र राष्ट्रपति को ही है.
सर्वप्रथम यह जाने की यह एक न्यायिक प्रकिया(judicial process) नही है,यह एक कार्यपालिक प्रक्रिया (executive process) है.
कोई भी राष्ट्रपति अपनी इच्छा मात्र से क्षमादान न्ही दे सकता है,अत: यह अधिकार अनन्य या सर्वोपरि न्ही है.इसमे शासन का मत अर्थात जनता का मत छुपा है.
तो प्रश्न की आख़िर क्षमादान क्यों??
जबकि हमारी सर्वोच्च न्यायालय ने किसी को दोषी ठहराया है.
इसका उत्तर हमारे लोकतंत्र(democracy) में छुपा है|
क्षमादान मूलत: हमारी सांविधानिक बाध्यताओं के उपर "जनमत"(people's will) की सर्वोच्चता है.(क्योकि राष्ट्रपति कार्यपालिका
जोकि आम जनता के मत का प्रतिनिधित्व करता है के सुझावोनुसार ही क्षमादान पर फ़ैसला लेता है|(sc ने ये बात कई बार स्पष्ट किया है-maru ram vs union of india case,dhananjay chatarjee vs UNI, ranga-billa case..etc).
   दूसरा यह मात्र grace है जो किसी अपराधी को उसके परिस्थितियों के अनुरूप दिया जाता है ना की कोई अधिकार है और इसका मूलमंत्र हमरी ऐतिहासिक संस्कृति मे है जो कहता है की "नफ़रत पाप से करो पापी से नही",सो परिस्थीतिवश अगर कोई अपराध करता है(सुंदर सिंह ...जोकि चरित्रवान् होकर भी दौरे मे आकर अपराध किया)तो उसे एक छोटा मौका तो मिलना चाहिए क्योंकि हमारी संपूर्णा न्यायिक व्यवस्था "सुधारात्मक है ना की दंडात्माक".
अंत मे यह प्रणाली न्याय के क्रम मे हुई किसी भी त्रुटि को अंत तक सुधारने का अंतिम प्रयास है.
अत: क्षमादान हमें मानवता को बचाने ,नैतिकता और नैसर्गिक मानवीय मूल्यों,करुणा और क्षमा करने का मौका देती है
परंतु ये भी कटु सत्या है की ये सारी दलीले और उच्च मानक निर्दोषों,भुक्ताभिगीयों और पीड़ितों के आक्रोश और दुख को ना कम कर सकती है ओर ना न्ययसंगत ठहरा सकती है,लेकिन हमे यह अवश्य द्‍यान रखना चाहिए की क्षमा ना सिर्फ़ हमारी संस्कृति ओर सभ्यता है वरन हमारा बड़प्पन और महानता भी. 

Tuesday, January 21, 2014

aawara galiyon ke raja.

किनके हैं ये बच्चे;
किसका उनपर हाथ;
आवारे,गलियों के राजा;
क्या ढूँढे हैं,कचरों;
क्यों, फिरते हैं सड़को पे सारी-सारी रात.

आख़िर क्या चाहते हैं "आप"


एक मुख्यमंत्री धरने पर,बड़ा धमाका,बड़ी-बड़ी चर्चाए;
 आदमी का मुख्यमंत्री,एक SHO के  निलंबन के लिए अपनी सत्ता दाव पर लगा रहा है!!!!!
भ्रष्टाचार के लिए इतनी बरी लड़ाई...
कितनी आकर्षक हैं ये लाइने...
सिविल परीक्षा तैयारी के मध्य भारतीय प्रशासन और संविधान पढ़ते-पढ़ते,अचानक रुक कर मैं लिखने क्यों बैठ गया???
संविधान निर्माण,प्रशासन ,उसकी कार्यप्रणाली ,संरचना,संविधानिक आदर्श ओर आस्था के अल्प ज्ञान ने ऐतराज जताने और कलाम उठाने पर मजबूर किया.
क्या जनतंत्र का मतलब ये है,क्या सड़क पर से नीतिगत फ़ैसले लोकतंत्र को मजबूत करेन्गि. भारत की विशालता इसे अप्रत्यछ लोकतंत्र बनती है यहाँ जनप्रतिनिधि द्वार शासन होता है ना की चौपाल लगा कर (स्विट्ज़रलैंड की तरह).
भ्रष्टाचार या कोई अन्य नीतिगत फ़ैसले तार्किक चर्चा,गहनशोध उपरांत संवैधानिक दायरे मे रहकर विधानसभा पूरी प्रक्रिया को अनुकरण कर किया जाता है ताकि कोई भूल ना हो ओर प्रशासन कुशलता से चले,देश का संघीए ढाँचा बना रहे.
क्या ये ग़लत है,तो फिर क्यों नही "दिल्ली पुलिस" के तथाकथित "अधिग्रहण" के लिए विधान सभा मे एक बिल पास किया गया...
कम से कम एक चिट्ठी ही लिख देते..
प्रक्रिया से इतना परहेज क्यों..
"ऐन्ग्री यनमैन" वाला इमेज बनाने की इतनी जल्दी क्यो,प्रशासन क खिलाफ इतना विष क्यो..
लोक-प्रशासन का बहुआयामी और बहुस्तरीय होना ही नीति निर्माण की खामी को कम करता है..कोई उत्तेजक "जनमत सर्वेक्षण" नही..हा ये उसका इक अंग ही सकता है
तो क्या अब शोध न्ही होंगे,विचार नही होगा,नियम क़ानून की प्रक्रिया का पालन नही होगा..सिर्फ़ " जनमत सर्वेक्षण" ही लोकतंत्र को मजबूती देगा क्योकि अब हमे विशिष्टता की ज़रूरत न्ही,मात्र "झुंड",प्रशिक्षिणहीन ओर तत्कालिक लाभों से ग्रस्त लोग नीति निर्माण करेंगे.
कम से कम संविधान तो ऐसे "सर्वेक्षण" को न्ही मनती(इक बार भी चर्चा न्ही है संविधान मे)
एक मशीनरी को कुशलतापूर्वक चलना,प्रक्रिया का पालन कर अपने हक़ मे फ़ैसला करवाना ही लीडरशिप है,"दबाब "की राजनीति,चक्का जाम करना मात्र ह्ठ ही है.
इससे "आप" मे ओर अलगाववादियों मे क्या अंतर रह जाता है,वे संविधान को नही मानते सो उनका तो तर्क बनता है ऐसा करने पर परंतु आप तो संविधान को मानने की बात करते हो,तो फिर उसके आदर्शो और मूल्यों पर अपने सोच को थोपने की कोशिश क्यो,इस प्रकार का दोहरा चरित्र क्यो...या तो अलगाववादियों की तरह स्पष्ट यूद्ध करो
ये छ्द्म्म युद्ध नही चलेगा.
आज पुलिस के लिए हठी मार्ग,कल वितीय स्वतंत्रता क लिय. परसो स्वायतता क लिए.
इस तरह तो संघ ही छिन्न-भिन्न हो जायगा.
अत: सोचें,मात्र भीड़ का हिस्सा ना बने,भारत को फिर ५६२ टुकड़ों मे बाँटने की कोशिश मे भूल कर भी हिस्सा ना बने..ग़लत सोच या परम्परा को स्थापित ना करे,
संविधान निर्माता मूर्ख नही थे,उनकी सोंच को समझे..सिर्फ़ अपना या तत्कालिक लाभ पर द्‍यान मत दे..
भारत की अखण्डता बनाए रखें.

Monday, January 20, 2014

BEFORE NAMO T5- SHOULD HAVE TO NOTICE B5


20th jan’s rhetoric T5  theory by Narendra Bhai Modi made me write on it. After a very micro surveillance, I concluded that it might  not  inimitably implementable, not because of its accomplishment but due to the lack of platform  in our country.
I m not criticizing the idea of modi but the depth of this draft is not sufficient . It looks like an uncanny halo which having a good intention but the lack of practicality . 
Does Narendra Bhai want to serve us a “new wine in a Brocken glass”. In his whole speech he focusing or what he is saying ,was called or announced  by many  people and by many government, many time in the past (as for a miner example bullet train –lalu had announced it many year ago in his budget speech.). Therefore, there is nothing new in this proposal.
Whatever he said is good but just like a new “KANGURA”(CYMBAL)  on an old ,porous fort. He never mention any idea about the overall change or strengthening of our basic infrastructure ,which is the basic for all his vision and that is not in a condition to hold the extra pressure of bullet train ,mega cities, IIT, AIIMS….
No country having all his best institution in every part ,just like that we having some good institution(I m not saying it is sufficient) but in a “BIMAROO” condition.
Therefore, the first thing need to address is –B5.
  # BASIC INFRASTRUCTURE – ROAD, PRIMARY HEALTH CLINIC, WATER….
# BASIC EMPLOYMENT ASSURANCE EDUCATION POLICY
# BASIC PLANNING MODEL LIKE “MAHALONOVAS MODEL”
# BASIC PROGRAMME THAT FETCH THE VERY BASIC REASON OF POVERTY AFTER 65 YRS OF INDEPENDENCE
# BALANCE OF PAYMENT
-THE establishment of new institution or new structure need a strong platform that is not available in our country, so if we develop any new thing it just likes a burden and might probably the new one also get the status of “bimaroo”.
Therefore, before developing new,modi should have to strengthen the power generation that give us manufacturing independency hence our economy turns to an export oriented from an import-oriented economy.
Boosting the “SEZ” AND “AEZ”,FTWZ.
Strengthening of basic health(having no primary health centre forget about AIIMs)…and many other sectors
-Focus on “structural retrogression”, capital formation, foreign trade ,planning model (in a economical copy –book manner),why our 5 yr planning model get fail ,why there is a need of straw like MGNREGA implemented, where we aberration from the trickle down effect of planning.
- focus on the fiscal deficit due to the imbalance of payment because of poor manufacturing capacity
 -Gender budget, condition of PSU,
-Form of planning-imperative or indicative ,centralized or decentralized, physical or social ,socialistic or capitalistic or both.
- Freedom of state in taxation under state-union financial relation
- On GAAR
- Agriculture finance
-Hindrance and corruption on public administration, bureaucracy.   
-Proper education policy not IIT that give a student employment and India a new innovative generation.
-On population.
These are one the minors among our critical national problem. As a youth a want the vision on these issue and the person who express himself look different from others or traditional face . I hope it from a envisage.
Therefore, if Mr. Modi focus on present system and give us a way to strengthen it then we must prepare a strong base to implement his T5.