ज़मीं लहू- नद से भाड़ा है,
चीत्कारों से दिशा-दस कोश शमा उजड़ा है,
अब तो जागो ,ऐ गद्दी के गिद्धों ,
देखों,चहुओर अपनों का शवकर्पट बिखड़ा है,
चलो,शुरू हो जाओ,बोली लगाओ,
देखो,तुम्हारे लिए भोजन बिखड़ा है,
चुन-चुन कर गिनती करते जाओ,
क्रदन स्वर को भाषनो से दबाओ,
और राहत का माल जाम कर खाओ
अब तो जागो ऐ नेता मेरे,
देखो हम पर क़हर ओर तुम पे मौला का क़रम बर्षा है...
चीत्कारों से दिशा-दस कोश शमा उजड़ा है,
अब तो जागो ,ऐ गद्दी के गिद्धों ,
देखों,चहुओर अपनों का शवकर्पट बिखड़ा है,
चलो,शुरू हो जाओ,बोली लगाओ,
देखो,तुम्हारे लिए भोजन बिखड़ा है,
चुन-चुन कर गिनती करते जाओ,
क्रदन स्वर को भाषनो से दबाओ,
और राहत का माल जाम कर खाओ
अब तो जागो ऐ नेता मेरे,
देखो हम पर क़हर ओर तुम पे मौला का क़रम बर्षा है...