Thursday, May 07, 2015

being human का मौका

चहुंओर आंशुओं ,अफसोसों की गंगा यमुना बह रही है ,अबूझ ,अंध ,अतार्किक आवेगों की प्रबल धारा में न्यायसंहिता ,सविधान और मानवीय संवेदना (जो एक ओर झुकी प्रतीत हो रही है,) ,नैतिकता छिन्न -भिन्न हो रही है ....
ऐसा सिर्फ हमारे देश में ही हो सकता है ,जहाँ एक अपराधी चाहे वह नेता (जयललिता के वक़्त भी कमोबेश यही हल था ) या अभिनेता को सजा सुनाये जाने पर इतना कोलाहल ,संवेदना की सुनामी आ जाती है ,जो दंतेवाड़ा या सीमा पर अथवा अपने कर्तव्य पथ पर शहीद किसी ईमानदार सरकारी कर्मचारी के मरने तक पर निःषठुर और असहिष्णु बना मौन रहता है,
शायद यही कारण है  की अपराधी राजनीती में या अन्य जगह भी इस publicity के कारण ना सिर्फ सफल होते हैं वरन उनका मनोबल भी आसमान पर होता हैं...
जहाँ सरे मानवीय अधिकार अपराधियों के ;लिए हों वहां कोई ईमानदारी को क्यों  चुने भला....
जैसे सैकड़ो अपराध , घोटाले करने के बाद भी हम "पिछला "सब भूल तात्कालिक आवेग(जाति,धर्म..और ना जाने क्या क्या )  में आकर अपना नेता चुन लेते हैं बिना ये सोंचे की उसका भूत क्या हैं...ऐसे ही सौ चूहें खा कर "हाजी" बने हमारा hero  पर  भी फैसला आते ही सब भूल-भाल कर तारीफें ,मासूमियत ,नेकियत का गुणगान होने लगा और इन सब में उस "मृत " और अपंग हो चुके भुक्तभोगी की चर्चा तक नही (क्योकि वो तो कुत्ता  हैं ना ) ..क्याकमल  संवेदना हैं...जो इकतरफा बह रही हैं,...हो सकता हैं थोड़ी सच्चाई और थोड़ी चाटुकारिता भी हो....,
चलो मान भी लूँ की हमारा hero वाकई में "दयालु" और परोपकारी इंसान हैं..तो क्या ये परोपकार "पीड़ित " के प्रति कहाँ चली जाती हैं ..क्यों एक कमांडो मात्र इसलिए भीख मांगने और मरने की कगार पे पहुँच जाता हैं क्योकि वह एक मात्र चश्मदीद था...शायद  भगवान बद्ध की शत्रुओं पर भी दया करने वाला दयालु होता वाला "definataion " हमारे hero पर लागु नहीं होता .....जबकि हीरो के लिए तो नियामक औरभी  कठोर होने  चाहिए...भाई आखिर वो हमारा आदर्श भी होता हैं...
 विवादों ,अनैतिक व्यवहार (ना जाने कितनो को तो थप्पड़ जड़ा होगा,मिडिया से भी) महिलाओ के अपमान (उनकी gf और कहानियां कौन भूल सकता हैं ,देशद्रोहियों के साथ लंच (भाई का भाई जो ठहरा ),और कानून की धज्जिया (एक नही कई )उडाता अपना हीरो सहिषुणता की बात करता हैं पर ये भूल जाता हैं की पाकिस्तानी चैनलों पर दिया 26 /11  वाला कथन क्या उन मरने वालों के प्रति सहिष्णु था चाहे वो आपकी नज़र में elite ही क्यों ना हों...
3 -4 सालों में आप (मुख्यतः being human बनने (estd -२०११) के बाद से ) "महान " परोपकारी बन गए जोकि आपके स्वभाव में तो नही दीखता (अभी भी आप की लड़ाइयां आम किस्सा हैं )...तो आप में नम्रता कहाँ हैं..., आपकी माफ़ी अपने अदने कनिष्ठ को क्यों नही मिलता (विवेक भाई साहब कई बाद कान पकड़ चुके )..और आप "बड़े दिल " वाले कहे जाते हैं..
तो क्या आप सुधर चुके या जिस संस्था का फेस बन अपना चरित्र बदलने के कोशिश में हैं (हाँ उसका growth -rate  4 ०० %हैं )वो क्या वाकई में पहल हैं (अगर हा तो मुझ से ज्यादा कोई खुश ना हो)या फिर टैक्स बचने और खुद को चमकाने की कोशिश (भाई business रिकॉर्ड तो कुछ और ही कह रही हैं )...या फिर बढ़ते उम्र के साथ समान्य मानव की तरह आपका भी जोश ठंडा हो चला हैं...हृदय वैसा का वैसा ही हैं...
खैर छोडो ..फैन हूँ पर अंधभक्त नही ..ईमानदार लगाव हैं पर संविधान और देश से ज्यादा नहीं..जोकि हमारा वास्तविक hero हैं..
और आप तो tiger हो तो plz सिंहावलोकन करे ..क्योकि कोई भी दलील अपराधबोध को नही कम कर सकती और कोई भी तर्क या  ,ngo ...पीड़ितों के "हाय " को नही दबा सकता ...सो  हमारे VEER अब आपकी बारी..गलती की एकमात्र प्राश्चित सजा भुगतने में हैं ..ना की अच्छाई खरीदने में ...
सिनेमा की कल्पना से बाहर आकर "वीरगति " सा शौर्य दिखाओ ..प्राश्चित की "तप" शायद तुम्हें भी "अंगुलिमाल" से महर्षि "वाल्मीकि " की गति दे.....
शुभकामना ....नए मौके के लिए ..