चौराहे का मंदिर देख सुलग उठी चिंगारी;
उफ़ !खींझ उठा देख मानव की कारगुजारी ;
सर्वश्व समर्पण कर,सदियों की जिनकी आरती;
निःषठुर हो कैसे, बिठा दिया फिर चाकरी;
चौराहे का मंदिर देख ,सत्य आया है सामने;
पग-पग बढ़ते देखा जिनको आपने;
कैसे झेल रहे? ,उनके ही ताने;
उफ़ !खींझ उठा देख मानव की कारगुजारी ;
सर्वश्व समर्पण कर,सदियों की जिनकी आरती;
निःषठुर हो कैसे, बिठा दिया फिर चाकरी;
चौराहे का मंदिर देख ,सत्य आया है सामने;
अपने उपवन के ही फुल बन गये है बेगाने ;
बदल गए है अब तो जग के अफसाने ;पग-पग बढ़ते देखा जिनको आपने;
कैसे झेल रहे? ,उनके ही ताने;
चौराहे का मंदिर देख,मचा ह्यदय में शोर ,
सभ्यता में आया न जाने कैसा मोर ;
अपनों ने अपनों से तोड़ा रिश्ते की डोर;
शर्म,हया,विश्वास का पतवार दिया है छोर;
मानव भाग रहा किस ओर?
चौराहे का मंदिर देख, सब समझ में आया;
जिन्दगी में जब कुछ कर नही पाया ;
हाय!एक मंदिर चुनवाया ;
तभी तो दो-जून ,बंदोबस्त हो पाया;
चौराहे का मंदिर देख, उठा एक विषाद;
विश्विधाता का किया कैसा हाल ;
फुल-पुष्प,आदर का अब कहा सवाल;
यहाँ तो लगा ,बस धुलो का अंबर;
चौराहे का मंदिर कह रही सारी कहानी ;
क्या बोलेंगे अब विधाता अपनी जुबानी;
सर्वश्रेठ कृति है जो प्राणी ;
उसी ने किया सब पानी-पानी;
फिर भी खुश है भाग्यविधाता ;
नासमझ के कुछ कम तो आया;
संतोष तो बस इस बात से पाया;
कम से कम ,इसने चेहरा तो दिखलाया ;
चौराहे का मंदिर देख;सिर्फ शर्म ही आया;
सदियों में,हाय! हमने कुछ नही पाया;