Monday, March 28, 2011
nanha nat: जूनून,जम्हूरियत और जिहाद
nanha nat: जूनून,जम्हूरियत और जिहाद: "जमाना 1983 का हो या 1992 ,या फिर 2011 .जूनून हमेशा सर चढ़ कर बोला है हिन्दोस्तान हो या पाकिस्तान क्रिकेट पुरे उपमहाद्वीप का ही पागलपन या यो..."
जूनून,जम्हूरियत और जिहाद
जमाना 1983 का हो या 1992 ,या फिर 2011 .जूनून हमेशा सर चढ़ कर बोला है|
हिन्दोस्तान हो या पाकिस्तान क्रिकेट पुरे उपमहाद्वीप का ही पागलपन या यो कहे दीवानगी है|
इस दीवानगी को कभी कम्पनीयो ने भुनाया तो कभी क्रिकेट बोर्ड ने |
व्यव्शायीकरण के इस दौड़ में भावनाओ को भी बेचने में कोई गुरेज नही |सभी ने अपनी-अपनी दुकाने खोल राखी है -कोई खेल बेच रहा ,कोई तेल बेच रहा,कोई नया अवतार (रा-one )बेच रहा और तो और कोई जम्हूरियत का बेमेल सेल लगा रहा |जब सभी इस जोश का मोल लगाने में लगे है तो हमारे निगेहबान राजनेता कैसे पीछे रहे उन्होंने भी राजनीती की पटड़ी लगा दी ,क्रिकेट के मैदान पर जम्हूरियत की बिशाद बिछा दी.
शतरंज की बिशाद बिछाने वालो ने शहीद सिपाही की भी सुध नही ली;भूल गए वे घाव जो अभी भी हरे है,मिट गई है दुरिया जो 60 सालों से जस के तस परे है..
अभी ही क्यों अचानक इतना प्यार आया??? या भीर ये मौके पे चौका है !!!!
कई बार इस जूनून से हुक्ममरानो ने अपनी जम्हूरियत जमाना चाहा, पर क्या हुआ??हर बार इक नया जिन्न निकला -कभी कारगिल के रूप में तो कभी 26 /11 के रूप में|
फिर भी अपनी रोटिया तो सेकनी है.डगमग -डगमग करती सत्ता और सर पर चढ़े भ्रष्टाचार के बेताल से छुटकारा पाने के लिए कुछ नया शोर जरुरी था -तो क्रिकेट से बेहतर क्या हो सकता है.ये तो ऐसा शोर है जिसमे दोनों मुल्को की आवाम अपने जलते घर को भी भूल जाऐ
.
और भी कई है जो फतबा जारी कर रहे है की ये धर्मयुद्ध है ,"कोई कह रहा है वर्ल्ड कप भी हमारा और कश्मीर भी हमारा" .
कही से आवाज आती है "हम मैच नही होने देंगे ", "इस प्रदेश नही आने देंगे "मनो जितने का अधिकार सिर्फ मेजबान को ही है .न जाने क्यों जूनून को जिहाद का नाम दे simple game को इतना भयावह बनाने पे तुले है .मनो हारने पर माफ़ी का सवाल ही नही ....
खेल न हुआ जी का जंजाल हो गया .
जूनून को जिहाद और जम्हूरियत पर चमकाना चलता रहेगा -चलता रहेगा ...
हम गला फाड़ का चिल्लाते रहेंगे .....हमें क्या कोई कुछ भी करे ,हम तो बस अपने खेल और खिलाड़ी को जीतते देखना चाहते है,बस !
यही तो है "जीत का जूनून " और यही है "जीत है जूनून की"|
हिन्दोस्तान हो या पाकिस्तान क्रिकेट पुरे उपमहाद्वीप का ही पागलपन या यो कहे दीवानगी है|
दीवानगी और पागलपन को मिलाने की इक मात्र कड़ी है "अति "मतलब अत्याधिक और यह काम हमेशा ही क्रिकेट ने किया है,मनो क्रिकेट न हुआ -तलवार चमकाने का मौका हो गया ,उत्साह-बर्धन के नारे कब विजय-घोष का रूप ले लिया पता ही न चला |
इस दीवानगी को कभी कम्पनीयो ने भुनाया तो कभी क्रिकेट बोर्ड ने |
व्यव्शायीकरण के इस दौड़ में भावनाओ को भी बेचने में कोई गुरेज नही |सभी ने अपनी-अपनी दुकाने खोल राखी है -कोई खेल बेच रहा ,कोई तेल बेच रहा,कोई नया अवतार (रा-one )बेच रहा और तो और कोई जम्हूरियत का बेमेल सेल लगा रहा |जब सभी इस जोश का मोल लगाने में लगे है तो हमारे निगेहबान राजनेता कैसे पीछे रहे उन्होंने भी राजनीती की पटड़ी लगा दी ,क्रिकेट के मैदान पर जम्हूरियत की बिशाद बिछा दी.
शतरंज की बिशाद बिछाने वालो ने शहीद सिपाही की भी सुध नही ली;भूल गए वे घाव जो अभी भी हरे है,मिट गई है दुरिया जो 60 सालों से जस के तस परे है..
अभी ही क्यों अचानक इतना प्यार आया??? या भीर ये मौके पे चौका है !!!!
कई बार इस जूनून से हुक्ममरानो ने अपनी जम्हूरियत जमाना चाहा, पर क्या हुआ??हर बार इक नया जिन्न निकला -कभी कारगिल के रूप में तो कभी 26 /11 के रूप में|
फिर भी अपनी रोटिया तो सेकनी है.डगमग -डगमग करती सत्ता और सर पर चढ़े भ्रष्टाचार के बेताल से छुटकारा पाने के लिए कुछ नया शोर जरुरी था -तो क्रिकेट से बेहतर क्या हो सकता है.ये तो ऐसा शोर है जिसमे दोनों मुल्को की आवाम अपने जलते घर को भी भूल जाऐ
.
और भी कई है जो फतबा जारी कर रहे है की ये धर्मयुद्ध है ,"कोई कह रहा है वर्ल्ड कप भी हमारा और कश्मीर भी हमारा" .
कही से आवाज आती है "हम मैच नही होने देंगे ", "इस प्रदेश नही आने देंगे "मनो जितने का अधिकार सिर्फ मेजबान को ही है .न जाने क्यों जूनून को जिहाद का नाम दे simple game को इतना भयावह बनाने पे तुले है .मनो हारने पर माफ़ी का सवाल ही नही ....
खेल न हुआ जी का जंजाल हो गया .
जूनून को जिहाद और जम्हूरियत पर चमकाना चलता रहेगा -चलता रहेगा ...
हम गला फाड़ का चिल्लाते रहेंगे .....हमें क्या कोई कुछ भी करे ,हम तो बस अपने खेल और खिलाड़ी को जीतते देखना चाहते है,बस !
यही तो है "जीत का जूनून " और यही है "जीत है जूनून की"|
Wednesday, March 02, 2011
CHAURAHE KA MANDIR
चौराहे का मंदिर देख सुलग उठी चिंगारी;
उफ़ !खींझ उठा देख मानव की कारगुजारी ;
सर्वश्व समर्पण कर,सदियों की जिनकी आरती;
निःषठुर हो कैसे, बिठा दिया फिर चाकरी;
चौराहे का मंदिर देख ,सत्य आया है सामने;
पग-पग बढ़ते देखा जिनको आपने;
कैसे झेल रहे? ,उनके ही ताने;
उफ़ !खींझ उठा देख मानव की कारगुजारी ;
सर्वश्व समर्पण कर,सदियों की जिनकी आरती;
निःषठुर हो कैसे, बिठा दिया फिर चाकरी;
चौराहे का मंदिर देख ,सत्य आया है सामने;
अपने उपवन के ही फुल बन गये है बेगाने ;
बदल गए है अब तो जग के अफसाने ;पग-पग बढ़ते देखा जिनको आपने;
कैसे झेल रहे? ,उनके ही ताने;
चौराहे का मंदिर देख,मचा ह्यदय में शोर ,
सभ्यता में आया न जाने कैसा मोर ;
अपनों ने अपनों से तोड़ा रिश्ते की डोर;
शर्म,हया,विश्वास का पतवार दिया है छोर;
मानव भाग रहा किस ओर?
चौराहे का मंदिर देख, सब समझ में आया;
जिन्दगी में जब कुछ कर नही पाया ;
हाय!एक मंदिर चुनवाया ;
तभी तो दो-जून ,बंदोबस्त हो पाया;
चौराहे का मंदिर देख, उठा एक विषाद;
विश्विधाता का किया कैसा हाल ;
फुल-पुष्प,आदर का अब कहा सवाल;
यहाँ तो लगा ,बस धुलो का अंबर;
चौराहे का मंदिर कह रही सारी कहानी ;
क्या बोलेंगे अब विधाता अपनी जुबानी;
सर्वश्रेठ कृति है जो प्राणी ;
उसी ने किया सब पानी-पानी;
फिर भी खुश है भाग्यविधाता ;
नासमझ के कुछ कम तो आया;
संतोष तो बस इस बात से पाया;
कम से कम ,इसने चेहरा तो दिखलाया ;
चौराहे का मंदिर देख;सिर्फ शर्म ही आया;
सदियों में,हाय! हमने कुछ नही पाया;
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