Wednesday, December 14, 2011
nanha nat: silk से समझ
nanha nat: silk से समझ: "picture " dirty हो या prity इनमे एक चीज की समानता हमेशा एक होती है -entertainment , entertainment ,और सिर्फ entertainment ... सवाल यह ...
nanha nat: silk से समझ
nanha nat: silk से समझ: "picture " dirty हो या prity इनमे एक चीज की समानता हमेशा एक होती है -entertainment , entertainment ,और सिर्फ entertainment ... सवाल यह ...
nanha nat: silk से समझ
nanha nat: silk से समझ: "picture " dirty हो या prity इनमे एक चीज की समानता हमेशा एक होती है -entertainment , entertainment ,और सिर्फ entertainment ... सवाल यह ...
nanha nat: silk से समझ
nanha nat: silk से समझ: "picture " dirty हो या prity इनमे एक चीज की समानता हमेशा एक होती है -entertainment , entertainment ,और सिर्फ entertainment ... सवाल यह ...
silk से समझ
"picture " dirty हो या prity इनमे एक चीज की समानता हमेशा एक होती है -entertainment , entertainment ,और सिर्फ entertainment ...
सवाल यह है की चित्रपट हमेशा सिर्फ entertainment ही दे या फिर इसके भी कुछ दायरे हो,कुछ जिम्मेदारी हो |
दर्शक क्या करे ,entertain होकर चला आऐ या फिर इनमे कुछ पाए ,इनमे कुछ खोये |
रोकर या हँश कर चला आये ,या इस दौर में जब साधू का सत्संग नही है,(और अगर है भी तो वे धर्म के management guru बन कर रह गए है ),कुछ सीखे ,कुछ सोचने पर मजबूर हो ?
कभी न कभी, हर दौर में cinema ने हमें प्रेरित किया है ,पर क्या प्रेरणा का कुछ असर हुआ ??
अगर sunny गावस्कर को देख कोई tendulkar बन सकता है ,IPL नए लड़कों को अच्छा खेलने के लिए प्रेरित कर सकता है तो फिर film 's क्यों नही ???
क्यों नही "प्रेमग्रंथ " देख लोग विधवा पुनः विवाह को प्रेरित होते है ,क्यों rang de basanti नए क्रांति का बिगुल नही फूंक पाती?,क्यों munna की गांधीगिरी screen से बाहर नही निकल पाती ???
अगर gessikalal हत्याकांड पर बनी फिल्मे hit हो सकती है तो वे हमें प्रेरित क्यों नही कर पाती की इस तरह की वारदात हो ही ना पाए ????
मानविये सोच कभी भी किसी भी चीज से प्रभावित हो सकती है ,बशर्ते उसे व्यापक तौर पे ,गंभीरता और रचनात्मकता के साथ प्रस्तुत किया जाये |
बहुत दिनों बाद आज इसी सोच ने लिखने को मजबूर किया |
dirty picture उस कड़ी में एक नया अध्याय है|
यह हमारी सच्चाई और समाज के विषांगत सोच को प्रदर्शित करती एक कड़वी सच्चाई है परन्तु क्या हम इसकी एक भी घूंट पिने को तैयार है |
हमने "स्मिता " (जिसे हम सिल्क स्मिता के नाम से जानते है ) को नाचते देखा ,कामलोलुप नयनो और लपलपाती जीभ से उसके गदगदाए शरीर को घुड़ा(मनो आखो में x -ray लगा हो ),उसके अंगराई ने हमें मद-मस्त किया , उसने दांत भींचे और हमने यहाँ आंह ली | पर..
क्या हमने silk की स्मिता(इज्जत) पर नज़र दौराया ????
स्मिता को "silk " किसने बनाया ???
जहाँ नारियों को दुर्गा के रूप में पूजने का रिवाज है,जब माँ हमें बचाने राक्षसों पर वार करती नर-चंडी बनती हैं तो हम नयनाभिराम आराधना में लीन रहते हैं |
अपनी आँखे बंद किये संग्राम के अंत का इंतजार करते रहते है| उनके रौद्र रूप और स्त्री के चरित्र के विपरीत उनके आचरण और प्रहार पर नज़र भी नही दौराते ,बस गद-गद होते रहते है|
शायद इसी कारण हम नारियों को लिक से हट कर कुछ करते देख नहीं देख पते |
हम अपनी आँखे बंद किये है,ताकी नारी को कुछ अलग करते नही देख सकते |
इसी कट्टर मानसिकता ने "स्मिता " को silk का नाम दे दिया क्योकि हम उसे देवी तो बना नहीं सकते और उसके पुरुषवादी समाज को टक्कर देने की छमता ,रवैया और साहस को देख नही सकते |
सो बदनाम ही कर दो -ताकी देखने का अधिकार भी मिल जाये और नैतिकता की दुहाई भी दे सके |
पर क्या समाज को जो एक स्मिता की "स्मिता " की रक्षा नही कर सकता -नैतिकता का पाठ पढ़ाने का हक है? .अगर समाज समानता का अधिकार नही दे सकता तो क्या उसे किसी के लिए protocol बनाने का अधिकार है ???
क्या किसी ने चहकती ,खिलखिलाती silk में पड़े सिलवटों को देखा ...
गुलाबी गलों में ,समाज के नाखूनों के घावों को पहचानने की जेहमत उठाई ??????
नही...!!!!!!!!!!!!
किसी ने सिक्के उछाले ,किसी ने समाज में गंदगी फैलाने की तोहमत लगाया तो किसी ने film बना इसकी marketing की |
तो क्या हमें हक है की हम खुद की गन्दगी साफ किये बगैर ,समाज सुधार के थोथरे उपाय सुझाये ....
जरुरत है ,सोच के बदलने की ,सिर्फ oooo ,la ...la ...पर ठुमके लगाने की बजाये उनमे छुपे कराहों को सुने |
और यदि किसी ने कोशिश भी की तो इतनी देर ना करे की परिवर्तन और नई सोच की आँधी तब तक थम हाय |
जरूरत है आज उस महा "बलिदान " (भले उसमे अंधी सफलता का शूरूर ही क्यों ना हो )को स्राधांजलि देने की जिसने समाज के पशुता को बांध कर रखा वरना यह आग घर-घर में फ़ैल जाती और रंगमंच की कहानियां हमारे आँगन को मैला करने लगती |
उस मौन पर मजबूत बांध को सदर नमन जिसने सरिफो के पंजो के निशान खुद पर झेल ,समाज की दीवारों को महफूज रखा......
सवाल यह है की चित्रपट हमेशा सिर्फ entertainment ही दे या फिर इसके भी कुछ दायरे हो,कुछ जिम्मेदारी हो |
दर्शक क्या करे ,entertain होकर चला आऐ या फिर इनमे कुछ पाए ,इनमे कुछ खोये |
रोकर या हँश कर चला आये ,या इस दौर में जब साधू का सत्संग नही है,(और अगर है भी तो वे धर्म के management guru बन कर रह गए है ),कुछ सीखे ,कुछ सोचने पर मजबूर हो ?
कभी न कभी, हर दौर में cinema ने हमें प्रेरित किया है ,पर क्या प्रेरणा का कुछ असर हुआ ??
अगर sunny गावस्कर को देख कोई tendulkar बन सकता है ,IPL नए लड़कों को अच्छा खेलने के लिए प्रेरित कर सकता है तो फिर film 's क्यों नही ???
क्यों नही "प्रेमग्रंथ " देख लोग विधवा पुनः विवाह को प्रेरित होते है ,क्यों rang de basanti नए क्रांति का बिगुल नही फूंक पाती?,क्यों munna की गांधीगिरी screen से बाहर नही निकल पाती ???
अगर gessikalal हत्याकांड पर बनी फिल्मे hit हो सकती है तो वे हमें प्रेरित क्यों नही कर पाती की इस तरह की वारदात हो ही ना पाए ????
मानविये सोच कभी भी किसी भी चीज से प्रभावित हो सकती है ,बशर्ते उसे व्यापक तौर पे ,गंभीरता और रचनात्मकता के साथ प्रस्तुत किया जाये |
बहुत दिनों बाद आज इसी सोच ने लिखने को मजबूर किया |
dirty picture उस कड़ी में एक नया अध्याय है|
यह हमारी सच्चाई और समाज के विषांगत सोच को प्रदर्शित करती एक कड़वी सच्चाई है परन्तु क्या हम इसकी एक भी घूंट पिने को तैयार है |
हमने "स्मिता " (जिसे हम सिल्क स्मिता के नाम से जानते है ) को नाचते देखा ,कामलोलुप नयनो और लपलपाती जीभ से उसके गदगदाए शरीर को घुड़ा(मनो आखो में x -ray लगा हो ),उसके अंगराई ने हमें मद-मस्त किया , उसने दांत भींचे और हमने यहाँ आंह ली | पर..
क्या हमने silk की स्मिता(इज्जत) पर नज़र दौराया ????
स्मिता को "silk " किसने बनाया ???
जहाँ नारियों को दुर्गा के रूप में पूजने का रिवाज है,जब माँ हमें बचाने राक्षसों पर वार करती नर-चंडी बनती हैं तो हम नयनाभिराम आराधना में लीन रहते हैं |
अपनी आँखे बंद किये संग्राम के अंत का इंतजार करते रहते है| उनके रौद्र रूप और स्त्री के चरित्र के विपरीत उनके आचरण और प्रहार पर नज़र भी नही दौराते ,बस गद-गद होते रहते है|
शायद इसी कारण हम नारियों को लिक से हट कर कुछ करते देख नहीं देख पते |
हम अपनी आँखे बंद किये है,ताकी नारी को कुछ अलग करते नही देख सकते |
इसी कट्टर मानसिकता ने "स्मिता " को silk का नाम दे दिया क्योकि हम उसे देवी तो बना नहीं सकते और उसके पुरुषवादी समाज को टक्कर देने की छमता ,रवैया और साहस को देख नही सकते |
सो बदनाम ही कर दो -ताकी देखने का अधिकार भी मिल जाये और नैतिकता की दुहाई भी दे सके |
पर क्या समाज को जो एक स्मिता की "स्मिता " की रक्षा नही कर सकता -नैतिकता का पाठ पढ़ाने का हक है? .अगर समाज समानता का अधिकार नही दे सकता तो क्या उसे किसी के लिए protocol बनाने का अधिकार है ???
क्या किसी ने चहकती ,खिलखिलाती silk में पड़े सिलवटों को देखा ...
गुलाबी गलों में ,समाज के नाखूनों के घावों को पहचानने की जेहमत उठाई ??????
नही...!!!!!!!!!!!!
किसी ने सिक्के उछाले ,किसी ने समाज में गंदगी फैलाने की तोहमत लगाया तो किसी ने film बना इसकी marketing की |
तो क्या हमें हक है की हम खुद की गन्दगी साफ किये बगैर ,समाज सुधार के थोथरे उपाय सुझाये ....
जरुरत है ,सोच के बदलने की ,सिर्फ oooo ,la ...la ...पर ठुमके लगाने की बजाये उनमे छुपे कराहों को सुने |
और यदि किसी ने कोशिश भी की तो इतनी देर ना करे की परिवर्तन और नई सोच की आँधी तब तक थम हाय |
जरूरत है आज उस महा "बलिदान " (भले उसमे अंधी सफलता का शूरूर ही क्यों ना हो )को स्राधांजलि देने की जिसने समाज के पशुता को बांध कर रखा वरना यह आग घर-घर में फ़ैल जाती और रंगमंच की कहानियां हमारे आँगन को मैला करने लगती |
उस मौन पर मजबूत बांध को सदर नमन जिसने सरिफो के पंजो के निशान खुद पर झेल ,समाज की दीवारों को महफूज रखा......
Tuesday, December 13, 2011
ilham(इल्हम)-inspiration
दरखतें मीनारों की रुसवाईयां सुनो ;
उजड़ी झोपडी के चारो के अन्दर तो झांको ;
फरफराती ताखातियाँ आवाज दे रही तुम्हे;
किसी पुराने लाइट-हाउस को घुड़ा है तुमने?
इतिहास के मंजरो से धुल तो जरा हटाना;
मिलेगा वो सब कुछ ,रूह जिसके तालाश में है अब तक;
पलकों से दूसरो को निहारना तो छोड़ो;
अपने पे इक बार नजरें तो फिराना ;
अंदाज अपना बनाओ फिर से शायराना ;
महरूमियत पे जुस्तजू की चादर तो चढ़ाना;
रु-ब-रु होंगी हर वो हबाब ;
सहेजा था जिसको बना कभी अपना ख्वाब ;
मुददते लाख बूड़ी क्यों ना हो;
पेंचीदा कितना भी क्यों ना हो सवाल हौसले डगमगा सकते है हर इक बार ;
मुश्किले रहबर में जब भी हो दो-चार ;
इत्मिनान रखना ,समझाना मन को बस इतनी सी बात ;
बादलों में छुप कर भी चाँद ठहरता नहीं;
चिर कर आता हर इक बार करने हमें गुलजार ;
बस इतनी बात है कहनी ,याद रखियो यार;
और कुछ हो ना हो ,महसूस करोगे हल्का हर बार ,हर बार ,हर इक बार|
उजड़ी झोपडी के चारो के अन्दर तो झांको ;
फरफराती ताखातियाँ आवाज दे रही तुम्हे;
किसी पुराने लाइट-हाउस को घुड़ा है तुमने?
इतिहास के मंजरो से धुल तो जरा हटाना;
मिलेगा वो सब कुछ ,रूह जिसके तालाश में है अब तक;
पलकों से दूसरो को निहारना तो छोड़ो;
अपने पे इक बार नजरें तो फिराना ;
अंदाज अपना बनाओ फिर से शायराना ;
महरूमियत पे जुस्तजू की चादर तो चढ़ाना;
रु-ब-रु होंगी हर वो हबाब ;
सहेजा था जिसको बना कभी अपना ख्वाब ;
मुददते लाख बूड़ी क्यों ना हो;
पेंचीदा कितना भी क्यों ना हो सवाल हौसले डगमगा सकते है हर इक बार ;
मुश्किले रहबर में जब भी हो दो-चार ;
इत्मिनान रखना ,समझाना मन को बस इतनी सी बात ;
बादलों में छुप कर भी चाँद ठहरता नहीं;
चिर कर आता हर इक बार करने हमें गुलजार ;
बस इतनी बात है कहनी ,याद रखियो यार;
और कुछ हो ना हो ,महसूस करोगे हल्का हर बार ,हर बार ,हर इक बार|
ilham(इल्हम)-inspiration
दरखतें मीनारों की रुसवाईयां सुनो ;
उजड़ी झोपडी के अन्दर तो झांको ;
फरफराती तख्तियां आवाज दे रही तुम्हे;
किसी पुराने
उजड़ी झोपडी के अन्दर तो झांको ;
फरफराती तख्तियां आवाज दे रही तुम्हे;
किसी पुराने
Monday, December 12, 2011
silk से समझ
"picture " dirty हो या prity इनमे हमेशा एक चीज की समानता रहती है -entertainment ,entertainment और सिर्फ entertainment .
सवाल यह है की चित्रपट हमेशा सिर्फ entertainment ही दे या फिर इसके भी कुछ दायरे हो ,कुछ जीम्मेदारी हो .
दर्शक क्या करे,entertain होकर चला आऐ या फिर इनसे कुछ पाऐ ,इनमे कुछ खोये .रोकर या हँश कर चला आऐ या इस दौर में
सवाल यह है की चित्रपट हमेशा सिर्फ entertainment ही दे या फिर इसके भी कुछ दायरे हो ,कुछ जीम्मेदारी हो .
दर्शक क्या करे,entertain होकर चला आऐ या फिर इनसे कुछ पाऐ ,इनमे कुछ खोये .रोकर या हँश कर चला आऐ या इस दौर में
प्रेम - विरह
सागर था इक हँशियों का ;
गोते लगाया करते थे ;
दर्रा बना खामोशी का;
पाटने में लगे रहते है |
जल-परी थी जो सागर की ;
उखड़ी -उखड़ी रहती है;
क्या गिला ,कौन-सा शिकवा ;
ना कुछ कहती है ,बस चुप -चुप सी रहती है |
हर आहट से होता उसका एहसास ;
हर पद में उसी का आभाष;
सह नही सकता ये आधात ;
जिए जा रहा लिए बस इक ही आश ;
नाराज सही ,पर दूर नहीं ;
है,हमारे ह्रदय के पास |
वो दिन फिर आएगा;
सूर्य रश्मियाँ छाऐंगी ;
करवल खग स्वर गूंजेगा ;
जाट-जाटिन मिल फिर नाचेंगी |
अंगराई लेती वो आऐगी ;
नाराजगी को भ्रम बतलाऐगी;
अलपक देखता देख मुझे ;
शर्माऐगी ,मुस्कायेगी ;
हल्की थपकी गालो पे लगा जायेगी|
मृग -तृष्णा में जलता मै;
अमृत रस को पाउँगा|
Wednesday, September 07, 2011
phir se!!!!!
फिर से ,फिर से ,आज फिर से;
छलनी हुआ देश का सीना फिर से;
रक्त लारियों से भींगी धरती फिर से;
आतंक लौट कर आया इक बार फिर से;
किसका दोष ,किसकी चूक ,पूंछे हम किससे ;
हृदय मद्य घुसा है शूल फिर भी बैठे है चुप से;
छलनी हुआ देश का सीना फिर से;
रक्त लारियों से भींगी धरती फिर से;
आतंक लौट कर आया इक बार फिर से;
किसका दोष ,किसकी चूक ,पूंछे हम किससे ;
हृदय मद्य घुसा है शूल फिर भी बैठे है चुप से;
दहशत चहुओर और चेहरे गम-सुम से;
कर्ण विदारक चीत्कारों को सुने हम अब कैसे;
होंगी जाँच ,बैठेंगी समितियां ,अब फिर से;
कोरी जिरह करेंगे सब मिल के ;
कोई ढाढस,किसी को लगेगा आम सा ;
कोई जोड़ेगा इसे किसी "रंग" से;
हूलड-हुड़दंग ,शोक सभाऐ,संसद स्थगन ,फिर से;
बड़ी -बड़ी चर्चाऐ,रोचक वार्ताऐ,फलक कैमरों के चप्पे -चप्पे;
आम होंगी फिर दह्शद गथाओ के किस्से ;
खूब बिकेंगी ये चर्चाऐ और लोक कल्याण की झूठी गप्पे ;
कल फिर कम होगा गर्माहट हल्क़े-हल्क़े;
फिर ग़ुम हो जाएँगे सब अंशु और आहे ;
प्रश्न अनुतरित छोर ,ठंढी होंगी फिर हवाए ;
चीख की खोज में,रक्तपात का इंतजार होगा फिर से |
Monday, June 06, 2011
BABA.VIVEKANAND OR BUSINESS
किसी ने कहा "प्लीज विवेकानंद और बाबा (अभी focus में चल रहे बाबा ...बाबा रामदेव ) में compair मत करो " पहले अजीब लगा ..शायद सही भी पर भाई कुछ दे बाद ख्याल आया..
क्यों ना करू ..क्यों नही हम विवेकानंद और रामदेव में तुलना कर सकते .....
दोनों ही self -made men है ,दोनों ने ही core indian और typical indian theories के जरिए प्रसिद्धी
पाई है|
विवेकानंद ने अपने भारतीय ज्ञान और दर्शन का अध्ययन किया,वेदों से दृष्टी पाई..और इसके उपरांत वेदान्त को नया रूप दिया ,नई पहचान दी|
अपने ज्ञान का प्रदर्शन दुनिया भर में किया ,chicago speech से पहचान पाया और पूरी दुनिया में अपने अनुयायी बनाये|
चंदा इकठ्ठा किया और रामकृष्ण mission की स्थापना तभी संभव हो पाई |
उन्होंने भी भारतीय संस्कृति ,राष्ट्रीयता पर जोर दिया और इनकी marketing की बदोलत ही प्रसिद्ध हुए |
पर वे इक आध्यात्मिक गुरु थे | hinduism उनके एजेंडे में सब से ऊपर था |और इसलिए अभी भी मुस्लिम उन्हें हिन्दू गुरु मानते है ,जब की वो भी उनके विचारो से प्रभावित हैं |
अब रामदेव .....
इन्होने ने भी भारतीय आदि सिद्धांतो और ज्ञान का अभ्यास किया और योग को नई परिभाषा दी,प्रचलित किया.
उपेक्षित भारतीय चिकित्सा को आत्म-बल दिया और उसी के जरिये धन भी अर्जित किया,पर लुटा नही ....हँ अधिक से अधिक प्रचार जरुर किया ,तो इसमें गलती क्या है...
इन्होने भी एकता,सर्व धर्म सद्भाव की बाते ही की..
तो क्या अंतर है बस समय का..और इस दौर के सोच का..वैसे ये सब बाते विवेकानंद को भी सहनी पड़ी थी ..
मै तो कहता हूँ अगर बाबा अपने से बाबा,स्वामी और महाराज की उपमा उतार फेंके तो वे गाँधी की तरह well -acceptebal या यो कहे सर्वमान्य मन सकते है क्योकि yoga सब धर्मो से परे है ,यह तो science है ,सो बाबा धर्मात्मा नही scientist हैं |
कोई भी भारतीय yoga और आयुर्वेद को जरुर बड़ते देखना चाहेगा ....क्या तुम नही?
वैसे भी यदि आप सफल नही है ..तो आपकी याग्यता किसी कम की नही ..कोई तुम्हे सुनने को तैयार ही नही होगा.
सो बाबा businesss men तो है ...उन्होंने भारतीय पुरातन पद्धति की मार्केटिंग भी की है तो इसमें धोखा क्या है उपेक्षा से अच्छा तो उधम है और उस उधम से कोई यदि पुरष्कृत हो रहा है तो खींझ किस बात की .....अगर किसी ने पारश पत्थर पर से मिटटी हटाई है तो उसे रोशनी तो मिलेगी ही ना..
वैसे भी उनकी दवाईया महेंगी नही है ..सुलभ और सस्ती है..ह़ा बिकती बहुत है सो incom तो होगा ही ना....
पर नही हमें तो आयुर्वेद और जोग को मिटटी क निचे और rainbaxy को इंडिया k सर पे बिठाना है.
भाई हम तो विरोध करेंगे ...अगर किसी ने भारतीयता का साथ देना चाह...
Monday, March 28, 2011
nanha nat: जूनून,जम्हूरियत और जिहाद
nanha nat: जूनून,जम्हूरियत और जिहाद: "जमाना 1983 का हो या 1992 ,या फिर 2011 .जूनून हमेशा सर चढ़ कर बोला है हिन्दोस्तान हो या पाकिस्तान क्रिकेट पुरे उपमहाद्वीप का ही पागलपन या यो..."
जूनून,जम्हूरियत और जिहाद
जमाना 1983 का हो या 1992 ,या फिर 2011 .जूनून हमेशा सर चढ़ कर बोला है|
हिन्दोस्तान हो या पाकिस्तान क्रिकेट पुरे उपमहाद्वीप का ही पागलपन या यो कहे दीवानगी है|
इस दीवानगी को कभी कम्पनीयो ने भुनाया तो कभी क्रिकेट बोर्ड ने |
व्यव्शायीकरण के इस दौड़ में भावनाओ को भी बेचने में कोई गुरेज नही |सभी ने अपनी-अपनी दुकाने खोल राखी है -कोई खेल बेच रहा ,कोई तेल बेच रहा,कोई नया अवतार (रा-one )बेच रहा और तो और कोई जम्हूरियत का बेमेल सेल लगा रहा |जब सभी इस जोश का मोल लगाने में लगे है तो हमारे निगेहबान राजनेता कैसे पीछे रहे उन्होंने भी राजनीती की पटड़ी लगा दी ,क्रिकेट के मैदान पर जम्हूरियत की बिशाद बिछा दी.
शतरंज की बिशाद बिछाने वालो ने शहीद सिपाही की भी सुध नही ली;भूल गए वे घाव जो अभी भी हरे है,मिट गई है दुरिया जो 60 सालों से जस के तस परे है..
अभी ही क्यों अचानक इतना प्यार आया??? या भीर ये मौके पे चौका है !!!!
कई बार इस जूनून से हुक्ममरानो ने अपनी जम्हूरियत जमाना चाहा, पर क्या हुआ??हर बार इक नया जिन्न निकला -कभी कारगिल के रूप में तो कभी 26 /11 के रूप में|
फिर भी अपनी रोटिया तो सेकनी है.डगमग -डगमग करती सत्ता और सर पर चढ़े भ्रष्टाचार के बेताल से छुटकारा पाने के लिए कुछ नया शोर जरुरी था -तो क्रिकेट से बेहतर क्या हो सकता है.ये तो ऐसा शोर है जिसमे दोनों मुल्को की आवाम अपने जलते घर को भी भूल जाऐ
.
और भी कई है जो फतबा जारी कर रहे है की ये धर्मयुद्ध है ,"कोई कह रहा है वर्ल्ड कप भी हमारा और कश्मीर भी हमारा" .
कही से आवाज आती है "हम मैच नही होने देंगे ", "इस प्रदेश नही आने देंगे "मनो जितने का अधिकार सिर्फ मेजबान को ही है .न जाने क्यों जूनून को जिहाद का नाम दे simple game को इतना भयावह बनाने पे तुले है .मनो हारने पर माफ़ी का सवाल ही नही ....
खेल न हुआ जी का जंजाल हो गया .
जूनून को जिहाद और जम्हूरियत पर चमकाना चलता रहेगा -चलता रहेगा ...
हम गला फाड़ का चिल्लाते रहेंगे .....हमें क्या कोई कुछ भी करे ,हम तो बस अपने खेल और खिलाड़ी को जीतते देखना चाहते है,बस !
यही तो है "जीत का जूनून " और यही है "जीत है जूनून की"|
हिन्दोस्तान हो या पाकिस्तान क्रिकेट पुरे उपमहाद्वीप का ही पागलपन या यो कहे दीवानगी है|
दीवानगी और पागलपन को मिलाने की इक मात्र कड़ी है "अति "मतलब अत्याधिक और यह काम हमेशा ही क्रिकेट ने किया है,मनो क्रिकेट न हुआ -तलवार चमकाने का मौका हो गया ,उत्साह-बर्धन के नारे कब विजय-घोष का रूप ले लिया पता ही न चला |
इस दीवानगी को कभी कम्पनीयो ने भुनाया तो कभी क्रिकेट बोर्ड ने |
व्यव्शायीकरण के इस दौड़ में भावनाओ को भी बेचने में कोई गुरेज नही |सभी ने अपनी-अपनी दुकाने खोल राखी है -कोई खेल बेच रहा ,कोई तेल बेच रहा,कोई नया अवतार (रा-one )बेच रहा और तो और कोई जम्हूरियत का बेमेल सेल लगा रहा |जब सभी इस जोश का मोल लगाने में लगे है तो हमारे निगेहबान राजनेता कैसे पीछे रहे उन्होंने भी राजनीती की पटड़ी लगा दी ,क्रिकेट के मैदान पर जम्हूरियत की बिशाद बिछा दी.
शतरंज की बिशाद बिछाने वालो ने शहीद सिपाही की भी सुध नही ली;भूल गए वे घाव जो अभी भी हरे है,मिट गई है दुरिया जो 60 सालों से जस के तस परे है..
अभी ही क्यों अचानक इतना प्यार आया??? या भीर ये मौके पे चौका है !!!!
कई बार इस जूनून से हुक्ममरानो ने अपनी जम्हूरियत जमाना चाहा, पर क्या हुआ??हर बार इक नया जिन्न निकला -कभी कारगिल के रूप में तो कभी 26 /11 के रूप में|
फिर भी अपनी रोटिया तो सेकनी है.डगमग -डगमग करती सत्ता और सर पर चढ़े भ्रष्टाचार के बेताल से छुटकारा पाने के लिए कुछ नया शोर जरुरी था -तो क्रिकेट से बेहतर क्या हो सकता है.ये तो ऐसा शोर है जिसमे दोनों मुल्को की आवाम अपने जलते घर को भी भूल जाऐ
.
और भी कई है जो फतबा जारी कर रहे है की ये धर्मयुद्ध है ,"कोई कह रहा है वर्ल्ड कप भी हमारा और कश्मीर भी हमारा" .
कही से आवाज आती है "हम मैच नही होने देंगे ", "इस प्रदेश नही आने देंगे "मनो जितने का अधिकार सिर्फ मेजबान को ही है .न जाने क्यों जूनून को जिहाद का नाम दे simple game को इतना भयावह बनाने पे तुले है .मनो हारने पर माफ़ी का सवाल ही नही ....
खेल न हुआ जी का जंजाल हो गया .
जूनून को जिहाद और जम्हूरियत पर चमकाना चलता रहेगा -चलता रहेगा ...
हम गला फाड़ का चिल्लाते रहेंगे .....हमें क्या कोई कुछ भी करे ,हम तो बस अपने खेल और खिलाड़ी को जीतते देखना चाहते है,बस !
यही तो है "जीत का जूनून " और यही है "जीत है जूनून की"|
Wednesday, March 02, 2011
CHAURAHE KA MANDIR
चौराहे का मंदिर देख सुलग उठी चिंगारी;
उफ़ !खींझ उठा देख मानव की कारगुजारी ;
सर्वश्व समर्पण कर,सदियों की जिनकी आरती;
निःषठुर हो कैसे, बिठा दिया फिर चाकरी;
चौराहे का मंदिर देख ,सत्य आया है सामने;
पग-पग बढ़ते देखा जिनको आपने;
कैसे झेल रहे? ,उनके ही ताने;
उफ़ !खींझ उठा देख मानव की कारगुजारी ;
सर्वश्व समर्पण कर,सदियों की जिनकी आरती;
निःषठुर हो कैसे, बिठा दिया फिर चाकरी;
चौराहे का मंदिर देख ,सत्य आया है सामने;
अपने उपवन के ही फुल बन गये है बेगाने ;
बदल गए है अब तो जग के अफसाने ;पग-पग बढ़ते देखा जिनको आपने;
कैसे झेल रहे? ,उनके ही ताने;
चौराहे का मंदिर देख,मचा ह्यदय में शोर ,
सभ्यता में आया न जाने कैसा मोर ;
अपनों ने अपनों से तोड़ा रिश्ते की डोर;
शर्म,हया,विश्वास का पतवार दिया है छोर;
मानव भाग रहा किस ओर?
चौराहे का मंदिर देख, सब समझ में आया;
जिन्दगी में जब कुछ कर नही पाया ;
हाय!एक मंदिर चुनवाया ;
तभी तो दो-जून ,बंदोबस्त हो पाया;
चौराहे का मंदिर देख, उठा एक विषाद;
विश्विधाता का किया कैसा हाल ;
फुल-पुष्प,आदर का अब कहा सवाल;
यहाँ तो लगा ,बस धुलो का अंबर;
चौराहे का मंदिर कह रही सारी कहानी ;
क्या बोलेंगे अब विधाता अपनी जुबानी;
सर्वश्रेठ कृति है जो प्राणी ;
उसी ने किया सब पानी-पानी;
फिर भी खुश है भाग्यविधाता ;
नासमझ के कुछ कम तो आया;
संतोष तो बस इस बात से पाया;
कम से कम ,इसने चेहरा तो दिखलाया ;
चौराहे का मंदिर देख;सिर्फ शर्म ही आया;
सदियों में,हाय! हमने कुछ नही पाया;
Tuesday, February 15, 2011
who i am
कौन हूँ मै ?
शायद जबाब ना मिले ,सिर्फ मुझे ही नही ,मुल्क के तमाम युवा को भी शायद जबाब चाहिए!
आखिर कौन हैं हम सब ??
वो जो रोज खुद से लड़ता है ,अपनी असफलता पर खिंजता है..अपने दोष किसी और पर मढ़ने की कोशिश में लगा रहता है...
सराय काले खा के फुटपाथ पर सोये बेघरो को देख कुढ़ता है,अन्दर ही अन्दर रोता है|
नॉएडा मोड़ की झोपड़ियो को बस की खिड़की से रोज देखता ,कुछ करने की चाहत में बस हाथ मलता रह जाता है|
कौन हूँ मै??
जो नित नई कसमे लेता है की "आज से तो बेटा हिला क पढ़ना है"(ये जानते हुए भी की यही कसम वह रोज खता है )
या फिर लडकियों को ना घूरने की गांठ बंधता है.....
या जो काँलेज क्लास छोर मूवी जाता है|जो बिना बात के पार्टी करता है ,पास होने की खुशी में महीने भर पढाई ही नही करता |
कौन हु मै??
जो कभी "आजाद भवन" में वर्तमान राजनीतिक अवस्था पर गंभीर व्याखायण देता है ,और कुछ पल बाद चुपके से सिगरेट पि उस गंभीरता को धुऐं में उड़ा जाता है|
अपने को खोजता हरिद्वार ,कशी से PUB और MALL छान मर आता है | जो काँलेज कैंटिंग में क्लास BANK करने की प्लानिंग करता....शायद किसी PROJECT PLANNING का पूर्वाभ्यास कर रहा हो |
आखिर कौन हूँ मै??
शायद खुद को साबित करने को आतुर ,समाज के बन्धनों को तोड़ने की ताक में, घावों पर मरहम लगाने को तत्पर , थोडा मस्त-मौला ,थोडा गंभीर ,आईने सा आक्स लिए ,बच्चो सा दिल लिए ,
विवेकानंद ,गाँधी और शकीरा को साथ करने में लगा ,वेदान्त और FACEBOOK में तार-तम्य बिठाता .....
संतुलन बनता इक यात्री ,इक अन्वेषक या यो कहो हिमनद से निकला एक नदी जो अपना रास्ता बनाने हेतु पहाड़ो
को भी तोड़ने को तत्पर है...
हा शायद यही हूँ मै..
पता नही...मन फिर भी कह उठता है "कौन हूँ मै"....
शायद जबाब ना मिले ,सिर्फ मुझे ही नही ,मुल्क के तमाम युवा को भी शायद जबाब चाहिए!
आखिर कौन हैं हम सब ??
वो जो रोज खुद से लड़ता है ,अपनी असफलता पर खिंजता है..अपने दोष किसी और पर मढ़ने की कोशिश में लगा रहता है...
सराय काले खा के फुटपाथ पर सोये बेघरो को देख कुढ़ता है,अन्दर ही अन्दर रोता है|
नॉएडा मोड़ की झोपड़ियो को बस की खिड़की से रोज देखता ,कुछ करने की चाहत में बस हाथ मलता रह जाता है|
कौन हूँ मै??
जो नित नई कसमे लेता है की "आज से तो बेटा हिला क पढ़ना है"(ये जानते हुए भी की यही कसम वह रोज खता है )
या फिर लडकियों को ना घूरने की गांठ बंधता है.....
या जो काँलेज क्लास छोर मूवी जाता है|जो बिना बात के पार्टी करता है ,पास होने की खुशी में महीने भर पढाई ही नही करता |
कौन हु मै??
जो कभी "आजाद भवन" में वर्तमान राजनीतिक अवस्था पर गंभीर व्याखायण देता है ,और कुछ पल बाद चुपके से सिगरेट पि उस गंभीरता को धुऐं में उड़ा जाता है|
अपने को खोजता हरिद्वार ,कशी से PUB और MALL छान मर आता है | जो काँलेज कैंटिंग में क्लास BANK करने की प्लानिंग करता....शायद किसी PROJECT PLANNING का पूर्वाभ्यास कर रहा हो |
आखिर कौन हूँ मै??
शायद खुद को साबित करने को आतुर ,समाज के बन्धनों को तोड़ने की ताक में, घावों पर मरहम लगाने को तत्पर , थोडा मस्त-मौला ,थोडा गंभीर ,आईने सा आक्स लिए ,बच्चो सा दिल लिए ,
विवेकानंद ,गाँधी और शकीरा को साथ करने में लगा ,वेदान्त और FACEBOOK में तार-तम्य बिठाता .....
संतुलन बनता इक यात्री ,इक अन्वेषक या यो कहो हिमनद से निकला एक नदी जो अपना रास्ता बनाने हेतु पहाड़ो
को भी तोड़ने को तत्पर है...
हा शायद यही हूँ मै..
पता नही...मन फिर भी कह उठता है "कौन हूँ मै"....
Thursday, February 10, 2011
mai veshya
गुलाबी गालो में छिपी आँशु की पपड़ी ;
कंचन काया से ढकी है सूखी अतड़ी;
रशीले होंठो पे बिखरी उदाशी की सोखी;
गाथा औरत की,जो बन सकी ना जननी|
पैदा होना था जिसका बैमानी ;
नवाजा जहा ने कह के हरामी ;
कुचला अपंखुरित ही जिसकी जवानी;
गाथा औरत की ,जिसकी सूनी गई ना कहानी |
बनना था जिसको किसी की धाती ;
रचती नई दुनिया जिसकी छाती;
बन गई है बिधाता की अधूरी चित्रकारी;
गाथा औरत की ,जो अमृत से बन गई है पानी;
आँचल था जिसका पवित्रता का साया ;
धुंध बदनामी का अब तो छाया ;
देवी का दुर्दिन कैसे हो पाया;
गाथा औरत की ,जिसकी दशा पर अफसोस भी ना आया;
चका-चौंध के मध्य कुढ़ रही नाड़ी;
भडाश,बेरुखी जिसकी जिसकी साखी ;
क्यों सोचे हम कौन लगती है हमारी ?;
गाथा औरत की ,गुदड़ी बन गई है जिसकी साड़ी|
आखिर किसकी है ये घ्रीनीत करनी ?;
या फिर,सभ्य समाज की काली चमड़ी ;
नैतिकता पर पड़ी कम्बल ये काली ;
गाथा औरत की ,जिसे हमने बनाया बदनाम गलियों की रानी|
आओ आब कुछ अलग कर जाये ;
अछूतों को चलो गले लगाये ;
इंसानियत की नई तस्वीर बनाये ;
गाथा औरत,की चलो जग को बतलाये|
कंचन काया से ढकी है सूखी अतड़ी;
रशीले होंठो पे बिखरी उदाशी की सोखी;
गाथा औरत की,जो बन सकी ना जननी|
पैदा होना था जिसका बैमानी ;
नवाजा जहा ने कह के हरामी ;
कुचला अपंखुरित ही जिसकी जवानी;
गाथा औरत की ,जिसकी सूनी गई ना कहानी |
बनना था जिसको किसी की धाती ;
रचती नई दुनिया जिसकी छाती;
बन गई है बिधाता की अधूरी चित्रकारी;
गाथा औरत की ,जो अमृत से बन गई है पानी;
आँचल था जिसका पवित्रता का साया ;
धुंध बदनामी का अब तो छाया ;
देवी का दुर्दिन कैसे हो पाया;
गाथा औरत की ,जिसकी दशा पर अफसोस भी ना आया;
चका-चौंध के मध्य कुढ़ रही नाड़ी;
भडाश,बेरुखी जिसकी जिसकी साखी ;
क्यों सोचे हम कौन लगती है हमारी ?;
गाथा औरत की ,गुदड़ी बन गई है जिसकी साड़ी|
आखिर किसकी है ये घ्रीनीत करनी ?;
या फिर,सभ्य समाज की काली चमड़ी ;
नैतिकता पर पड़ी कम्बल ये काली ;
गाथा औरत की ,जिसे हमने बनाया बदनाम गलियों की रानी|
आओ आब कुछ अलग कर जाये ;
अछूतों को चलो गले लगाये ;
इंसानियत की नई तस्वीर बनाये ;
गाथा औरत,की चलो जग को बतलाये|
Tuesday, February 08, 2011
Avoid Status And Catch The Metro
Last week ,a NRI relative of mine came to smell the soil of his root i.e he came to India after a long span of time(perhaps he may have show movie swadesh....).
The Indian growth and development made him a happy man..He was very influenced to see the CHAKA
-CHAUDH and denting-painting of his native home.Recent exaltation provide him the proud to discribe india as "golden bird"once again.
Resultantly he came to delhi to observe the mentality of new looked,renovated (hv no ideas it is bcz of commonwealth) Delhi-the face of our country.
Now its my responsibility for his "DELHI DARSHAN". As good host ...avoiding my finance i manage a car for him.
but...what happen???
he totally deny to travel with the car.
but why...because of metro...he want Delhi metro.It made me to think "foreigner also know the metro's grandeur" and the very first time i grasp some gravity due to metro (otherwise i m very distress to wasp).
After some time i acquaintance with the other face of him.
gentlemen was addicted to travel by public transport and using TUBE(London metro) for his circulation.
Due to groundless attraction to foreigner soil,curiously i ask him "you have inestimable treasure,many cars,... then why u use tube??".
very strangely and with unknown expression he said "what non-sense u talking about.... whats the link between my liberties and public transport".
then with sweet smile(perhaps he felt pity ) try to convince me"its our duty to prevent and support to prevent the global warming and the fuel inefficiency".
he was continuing"we all ,even directors of com, CEO,were running for tube with his necktie and Lappy in hand".
The advice gave me divine knowledge...(just like "BATI JAL GAI MERI").
we are treating car as a status symbol.we walk alone toward our 6 seater car as a king avoiding the fact the our situation is just as a bagger for 80% petrol.
we must decrement our time and work capacity in a huge jam on road.but never compromise with our social status..
yes we develop a lot but what about our mentality.....
we all know....WHI....KHATI DESHI!!!!
WAH! RE GROWTH....
The Indian growth and development made him a happy man..He was very influenced to see the CHAKA
-CHAUDH and denting-painting of his native home.Recent exaltation provide him the proud to discribe india as "golden bird"once again.
Resultantly he came to delhi to observe the mentality of new looked,renovated (hv no ideas it is bcz of commonwealth) Delhi-the face of our country.
Now its my responsibility for his "DELHI DARSHAN". As good host ...avoiding my finance i manage a car for him.
but...what happen???
he totally deny to travel with the car.
but why...because of metro...he want Delhi metro.It made me to think "foreigner also know the metro's grandeur" and the very first time i grasp some gravity due to metro (otherwise i m very distress to wasp).
After some time i acquaintance with the other face of him.
gentlemen was addicted to travel by public transport and using TUBE(London metro) for his circulation.
Due to groundless attraction to foreigner soil,curiously i ask him "you have inestimable treasure,many cars,... then why u use tube??".
very strangely and with unknown expression he said "what non-sense u talking about.... whats the link between my liberties and public transport".
then with sweet smile(perhaps he felt pity ) try to convince me"its our duty to prevent and support to prevent the global warming and the fuel inefficiency".
he was continuing"we all ,even directors of com, CEO,were running for tube with his necktie and Lappy in hand".
The advice gave me divine knowledge...(just like "BATI JAL GAI MERI").
we are treating car as a status symbol.we walk alone toward our 6 seater car as a king avoiding the fact the our situation is just as a bagger for 80% petrol.
we must decrement our time and work capacity in a huge jam on road.but never compromise with our social status..
yes we develop a lot but what about our mentality.....
we all know....WHI....KHATI DESHI!!!!
WAH! RE GROWTH....
Monday, February 07, 2011
New 'LATHI' of Gandhi
January 2010-ASMA MAHFOUZ(titled as bravest girl in egpt) uploaded a mace video.....
And the Arab world awake to its ironical praise.
Without any weapon,any voilence(very common and cavalier for revolt)......after long span gandhi once again came in focus.
Dislocation of 30year old authoritarianism, altimate grown of anxiety of arab.....how could it happen??
Non-voilence,truth and the"satyagrah"(perhaps materlistic boys or you can say todays indian think it is myth and not practical at all in this era) tore the Hosni mubarak's malediction.
But how???
How youth gain so much strength ??
Yes! it is right that the explosive had been storing for along time but the question is who affinited it with the final emders.
Who is the prior??
Who came to sieve the dust over SATYA and AHINSA.
Who slap all those who thik that gandhi's perfects are not aplicable in this era.
And the answer is ...one n only socal networking sites(best place for youth after beloved lap).
This is the latest,upgrated LATHI of Gndhi...
FACEBOOK,TWITTER AND FLICKR is the three monkey of gandhi....it help us to recognise what is happenings(na dekhne ka jmana gya).
these three made u to uplift the OSKARS(bt u mst have the skill of film making).
Help u to find friends,provide you to express your feelings and if you are in need ..provide you the support in form of sympthy,right and even mass.
GANDHI was a great instigator and always remain so.the only one thing is needed to shape his ideas according to situation and time,balance it with new age mentality.
Facebook and other did the same and must got the 100% for it.
Thousend of young gun(it is said ....youth have boiled blood in their vain) gave 'satyagrah "a new face .
Socal networking is the best way these day.
If whole Arab stand on its feet by a video clip then what about INDIA.
After all we have 5 hr long tape of RADIA,175000cr's scam document,and the a everending youth of IIT,NIT,DU,JNU,BHU and many more ,great leadership of doc,eng,student(the tools of egpt's revolt).
Then why not we stand against mishappening of our country.
TO JAGO INDIA OR VIRODH KARO....
And the Arab world awake to its ironical praise.
Without any weapon,any voilence(very common and cavalier for revolt)......after long span gandhi once again came in focus.
Dislocation of 30year old authoritarianism, altimate grown of anxiety of arab.....how could it happen??
Non-voilence,truth and the"satyagrah"(perhaps materlistic boys or you can say todays indian think it is myth and not practical at all in this era) tore the Hosni mubarak's malediction.
But how???
How youth gain so much strength ??
Yes! it is right that the explosive had been storing for along time but the question is who affinited it with the final emders.
Who is the prior??
Who came to sieve the dust over SATYA and AHINSA.
Who slap all those who thik that gandhi's perfects are not aplicable in this era.
And the answer is ...one n only socal networking sites(best place for youth after beloved lap).
This is the latest,upgrated LATHI of Gndhi...
FACEBOOK,TWITTER AND FLICKR is the three monkey of gandhi....it help us to recognise what is happenings(na dekhne ka jmana gya).
these three made u to uplift the OSKARS(bt u mst have the skill of film making).
Help u to find friends,provide you to express your feelings and if you are in need ..provide you the support in form of sympthy,right and even mass.
GANDHI was a great instigator and always remain so.the only one thing is needed to shape his ideas according to situation and time,balance it with new age mentality.
Facebook and other did the same and must got the 100% for it.
Thousend of young gun(it is said ....youth have boiled blood in their vain) gave 'satyagrah "a new face .
Socal networking is the best way these day.
If whole Arab stand on its feet by a video clip then what about INDIA.
After all we have 5 hr long tape of RADIA,175000cr's scam document,and the a everending youth of IIT,NIT,DU,JNU,BHU and many more ,great leadership of doc,eng,student(the tools of egpt's revolt).
Then why not we stand against mishappening of our country.
TO JAGO INDIA OR VIRODH KARO....
Sunday, February 06, 2011
NANHA NAT
देख रहा मै चांदनी चौक की भीड़ में ;
खेल रहा वो मानव-सागर के मध्य में ;
खुला देह और अस्थि रंजित है काया ;
तेज दुपहरी भी सर चढ़ कर है आया |
दिखा रहा है अपने से बढ़ कर करतब ;
ना थकावट ,ना पशीना कहा है इन से मतलब |
कभी दौरता,कभी कूदता ;
रस्सी की पगडण्डी पर चलता;
तरह-तरह से है रिझाता;
उम्र से बढ़ सब कर जाता;
कौतुहल बस देख रहा मै एक -टक;
एकाग्रता से टिका नन्हा नट|
एक से बढ़ कर एक खेल दिखता ;
फिर थक कर बैठ है जाता ;
बिखरती भीड़ देखता रह जाता;
अनायास ही विनय हाथ फैलता |
स्नेहरहित खड़ा अकेला वह निष्कपट ;
नीर-नैनों से शुन्य घूरता नन्हा नट|
शुष्क त्वचा और रक्त-रंजित हैं ऐडिया;
दुर्बल देह बहा रही श्रम-रस की नदिया ;
गुलाबी गालो में बची बस सुखी पंखुरिय ;
किलकारियों को बंधे ना जाने कौन सी बेड़िया|
बचपन की सोखी से दूर संघर्ष करता अनवरत ;
दिव्या शक्ति से चमकता नन्हा नट|
खिलौनों से बंचित हाथ ;
ना साया ,ना ही कोई साथ;
उदर-पूर्ति को खुद ही आत्म-साथ ;
कूड़े में ही ढूंढ़ रहा उज्वल उल्लास |
मासूमियत पर लिए उदाशी की कड़वाहट;
बिना शिकायत मुस्कुराता नन्हा नट |
कहा संवेदनहीन संसार को है एहसास ;
क्या चढ़ेगा इस नूतन अभिलाष पर पुष्प पलाश ;
कब पड़ेगा पंकज कलियों पर स्नेह प्रकाश ;
कब होगा मानव को मानव दुखः का आभास |
ना बचपना, ना ही कोई बाल-हट ;
असमय ही बड़ा हो गया नन्हा नट|
अचानक तालियों की आई गड़गड़ाहट;
शायद विराम की है आहट,
पर,अभी और खेलेगा नन्हा नट|
नन्हा पूछ रहा जग से प्रश्न प्रबल ;
कब तक धुल-धूसरित रहेंगे राज-कवल;
क्या इसका जीवन भी बन जायेगा मरुअस्थल ;
बचपन मांग रहा सभ्य भीड़ से इसका हल |
भीड़ की आर में देख रहा माजरा विकट;
देव-शक्तियुक्त ,अविराम खेलता नन्हा नट |
खेल रहा वो मानव-सागर के मध्य में ;
खुला देह और अस्थि रंजित है काया ;
तेज दुपहरी भी सर चढ़ कर है आया |
दिखा रहा है अपने से बढ़ कर करतब ;
ना थकावट ,ना पशीना कहा है इन से मतलब |
कभी दौरता,कभी कूदता ;
रस्सी की पगडण्डी पर चलता;
तरह-तरह से है रिझाता;
उम्र से बढ़ सब कर जाता;
कौतुहल बस देख रहा मै एक -टक;
एकाग्रता से टिका नन्हा नट|
एक से बढ़ कर एक खेल दिखता ;
फिर थक कर बैठ है जाता ;
बिखरती भीड़ देखता रह जाता;
अनायास ही विनय हाथ फैलता |
स्नेहरहित खड़ा अकेला वह निष्कपट ;
नीर-नैनों से शुन्य घूरता नन्हा नट|
शुष्क त्वचा और रक्त-रंजित हैं ऐडिया;
दुर्बल देह बहा रही श्रम-रस की नदिया ;
गुलाबी गालो में बची बस सुखी पंखुरिय ;
किलकारियों को बंधे ना जाने कौन सी बेड़िया|
बचपन की सोखी से दूर संघर्ष करता अनवरत ;
दिव्या शक्ति से चमकता नन्हा नट|
खिलौनों से बंचित हाथ ;
ना साया ,ना ही कोई साथ;
उदर-पूर्ति को खुद ही आत्म-साथ ;
कूड़े में ही ढूंढ़ रहा उज्वल उल्लास |
मासूमियत पर लिए उदाशी की कड़वाहट;
बिना शिकायत मुस्कुराता नन्हा नट |
कहा संवेदनहीन संसार को है एहसास ;
क्या चढ़ेगा इस नूतन अभिलाष पर पुष्प पलाश ;
कब पड़ेगा पंकज कलियों पर स्नेह प्रकाश ;
कब होगा मानव को मानव दुखः का आभास |
ना बचपना, ना ही कोई बाल-हट ;
असमय ही बड़ा हो गया नन्हा नट|
अचानक तालियों की आई गड़गड़ाहट;
शायद विराम की है आहट,
पर,अभी और खेलेगा नन्हा नट|
नन्हा पूछ रहा जग से प्रश्न प्रबल ;
कब तक धुल-धूसरित रहेंगे राज-कवल;
क्या इसका जीवन भी बन जायेगा मरुअस्थल ;
बचपन मांग रहा सभ्य भीड़ से इसका हल |
भीड़ की आर में देख रहा माजरा विकट;
देव-शक्तियुक्त ,अविराम खेलता नन्हा नट |
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