Monday, December 12, 2011

प्रेम - विरह


 सागर था इक हँशियों का ;
गोते लगाया करते थे ;
दर्रा बना खामोशी का;
पाटने में लगे रहते है |
                जल-परी थी जो सागर की ;
                 उखड़ी -उखड़ी रहती है;
                क्या गिला ,कौन-सा शिकवा ;
               ना कुछ कहती है ,बस चुप -चुप सी रहती है |
हर आहट से होता उसका एहसास ;
हर पद में उसी का आभाष;
सह नही सकता ये आधात ;
जिए जा  रहा लिए बस इक ही आश ;
नाराज सही ,पर दूर नहीं ;
है,हमारे ह्रदय के पास |
                 वो दिन फिर आएगा;
             सूर्य रश्मियाँ छाऐंगी ;
            करवल खग स्वर गूंजेगा ;
           जाट-जाटिन मिल फिर  नाचेंगी |
अंगराई लेती वो आऐगी ;
नाराजगी को भ्रम बतलाऐगी;
अलपक देखता देख मुझे ;
शर्माऐगी ,मुस्कायेगी ;
हल्की थपकी गालो पे लगा जायेगी|
                    मृग -तृष्णा में जलता मै;
                   अमृत रस को पाउँगा|

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