Monday, May 04, 2015

राजनीती की खेती और .राहत की फसल

संसद से सड़क तक हंगामा,रैलियां ,"हवाई" नेता भी पद -यात्रा पर .चारों तरफ एक ही गूंज और उसका केंद्र -बिना किसी लाग-लपेटे के अपने स्वेद बूंदों से मुझे सिंचता मेरा हमसफ़र "किसान".
और इन सभी चर्चाओ से दूर ,कैमरे की फलक के बगैर ,उदासीन ,उजड़ा ,निरीह ,अपने बच्चों से फसल को सड़ता देखता ,अपने हमसफ़र के आंशूं पोछने में असक्षम हीन-भावना से घिरा मैं-"खेत" जिसका खलिहान आज सूना है और नचाहि भीड़ और "महानुभावों" के दंगल का अड्डा बना है.
आज भले मैं "प्रकृति" का मारा हूँ और ओलों की मर सहने के बाद शायद "महान" नेताओं की अथक प्रयास से मेरे हमसफ़र को थोड़ी "सरकारी राहत" के फुहारे मिल जाए ,पर क्या ये सदियों से बने "नासूर" जो बिना किसी आपदा के भी इतना ही टीस देता है पर मलहम लगाएगा ..
शायद ही किसी को इस "नासूर" पर ध्यान  जाये..लोग तो बस मौसमी जख्म ही देखेंगे ..और जाये भी कैसे "किसानी"और खेतों में घूमने वाले जन-प्रिये लोग इस विविधतापूर्ण देश कोई और मामले पर "हल्ल्ला" मचा देंगे जो इन कराहों को दबा देंगे.और किसी को पता भी नहीं चलेगा और ना कोई जेहमत उठाएगा की क्या खेती पर मास आय की गारंटी देता है.. कम से कम मनरेगा की तरह ही सही..किसी को पता चलेगा की राष्ट्रीय प्रति -व्यक्ति  आय के आधे से भी कम आय पर किसान कैसे जीता है...
क्या हमारा ये कृषि-प्रधान देश मात्र प्राकृतिक आपदा का मारा है या बिना किसी आपदा के भी अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है..."असल"में इसकी क्या समस्या है और किस कदर विकट है.
सोये फसलों की "राजनितिक सेज " से क्या इसके पुरातन मॉडल ,छोटी होती जोतों ,क्षमता से अधिक श्रम -शक्ति के संलग्न रहने ,आधुनिकीकरण के नाम पर रासायनिक खादों के अधिकाधिक प्रयोग,बदलते मौसम-चक्र,पशुपालन-विहीन खेती ,जैसे बहु आयामी और अलग-अलग क्षेत्र से खेती को प्रभावित करने वाले कारकों पर मंथन करेंगे या मात्र ....
क्या कोई किसान के फसल का उचित मूल्य मिलने....बिचौलिए ,खेती का आरंभिक शिक्षा में शामिल किये जाने ...आधुनिक और व्यावसायिक खेती की किसानो को समय-समय पर प्रशिक्षण की रणनीति पर विचार करेगा ...
अपनी ताक़त और आकर को छोटा होते देखता नै  जनता हूँ की ऐसा कुछ नहीं होगा..कोई कवि परवर्तित नेता अपने "प्रेरणा " से या यो कहो अपने नाट्य के कुशल निर्देशन द्वारा "फांसी" पर चढ़वा देगा तो कोई छोपड़ी के साथ फोटो खिंचवा रहनुमा बंनने में लगा रहेगा .. वातानुकूलित माहौल में किसानी पर व्याख्या देगा...नहीं तो बहुत से बहुत "रहत "...और फिर इन दीर्घा कलिक और वास्तविक हल के वगैर त्रासदी का इंतजार ताकि फिर कैमरे चमकें...
तो क्या करूँ मैं पर किसान ...जब तक बन पड़ता है पिसुंगा और फिर....दो दसको से लोकप्रिय " आत्महत्या " तो है ही और मैं "अधिगृहीत और बंजड तो ही रहा हूँ...
आप साचो ...आगे आपकी बारी..मेरे सीने पर बहुमंजिला इमारतों में बैठे बैठे भूख से तरपने की ...मरने की...

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