Tuesday, May 12, 2015

किस ओर जा रहें हैं..

अक्षम्य,अराजक ,क्रोधित या मात्र घृणित ...क्या कहूँ ..ना समझ में आ रहा और ना चयन हेतु "भाव" मिल रहें हैं ..बस दुःख और अपने मानव होने पर घिन ही आ रही है.
एक ड्राइवर की गलती या लापरवाही (जो इतनी बड़ी तो कम से कम नही ही है जिसका हर्जाना वो जान देकर चुकाए ),या मात्र एक दुर्घटना अथवा motorcycle सवार का असंतुलन परिणाम motorcycle सवार का भीड़ -भाड़ में (जहा अमूमन गाड़ियां धीरे ही सडकती हैं )का  गिर जाना फिर तमाम लाव-लस्कर के साथ उस बस ड्राइवर पर टूट पड़ना और उसे जान से मार् देना और फरार हो जाना..ये कोई चलचित्र का दृश्य नहीं है और ना ही मारने वाले बदनाम अपराधी ...ये तो दो आम जनो की और समान्य सी  होने वाले झगड़ों का असामान्य रूप  में परिवर्तन है की कहानी है ....
तो क्या मैं सिर्फ इसीलिए व्यथित हूँ ...ऐसा तो रोज होता है..हत्या तो आम "दिनचर्या"बन गयी है... तो फिर इतना क्या कष्ट ..ऐसा क्या अति -प्रतिक्रिया ..
या फिर इस लिए की की समाजशात्र के जिन " मूलभूत सिद्धांतो"को अपढ़ता ,पढता और अभ्यास करता आया उनको गलत और अप्रशंगिक होता देख झुंझला रहा हूँ..  या फिर चहुंओर फैले अशंतोष का  फट पड़ने ...या समाज के तौर पर संस्था की असफलता की हर व्यक्ति अकेला ओर गुस्से से भड़ा है...या जीवनशैली के अनियमित होने का प्रतिफल जिसने हमे इतना हिंसक बना दिया है...इन सब से अचंभित और सशंकित हूँ ..
मानव एक सामाजिक प्राणी है ...क्या अब ये वाक्य मैं स्मृति से हटा दूँ ..तब फिर 'समाजशास्त्र ',मानविकी और नैतिकता क्या करूँगा ....
एक -दूसरे के साथ समन्वय ,सहायता और आपसी सहयोग के आधार पर जिस समाज शब्द की उत्पति और निहितार्थता चरितार्थ होती थी ,क्या वे अभी भी उतने ही सुदृढ़ हैं ...तो फिर वहां खड़े भिड़ के किसी शख्स ने रोक क्यों नही..अगर रोकने का सामर्थ्य नही था तो टोकना तो था...ये अन्याय कैसे कोई पशुवत (अरे वो भी अपने झुण्ड के सदस्य पर हुए हमले का प्रतिकार करते हैं ) देखता रह सकता है.. क्या ये मानवीय लक्ष्यं हैं या हम पशुता की और चल निकले हैं...
वो जिसने ये कृत्या किया वो तो मानवता से" परे" हो ही चला था और हो सकता है "भावनात्मक अपहरण "  का शिकार हो..... अपने मष्तिष्क पर से अंकुश खो चूका हो पर उस "सभ्य"और समान्य भीड़ का क्या...
क्या अब ये समाज मानवता का वहन करने योग्य रह गया है...इससे तो अच्छा "जंगल " हैं...
शायद मेरा "सामाजिक प्राणी"कंक्रीटों के इस जंगल में दम  तोड़ चूका ...
कहीं भी "पाप",अन्याय ,पशुता वहां मौजूद गलत ताकतों और तत्वों के कारण नहीं उत्थित होता वरन आम .नैतिक और शिष्टों के उदाशीनता और जिम्मेवारियों से मुँह चुराने के कारण होतें हैं ...
हाँ शायद यही "टिस" है..की हम मानव होने का हक़ और सामर्थ्य खोते जा रहें हैं ....पता नही किस ओर जा रहें हैं.... 

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