तमाम उपलब्धियों ,बुद्धिमत्ताओ i और
रचनात्मकताओं के बाद
भी मानव सदैव
मानव ही रहेगा
,प्रकृति के दीये
गुण-दोषों रूपी
सीमाओं से
लिपटा हुआ |
किसी चीज को
सकारात्मक अथवा नकारात्मक
रूप में लेना
इन्ही प्राकृतिक सीमाओं
की एक कड़ी
है जो कभी
मानव को सर्वोत्तम
तो कभी दुर्बलतम
की श्रेणी में
ला खड़ा करता
है |
इसका नवीनतम उदहारण कर्नाटक
के मैसूर में
हो रहे हल्ले
से उद्घोषित हो
रहा है |मैसूर
नरेश "टीपू सुल्तान"
एक बार फिर केंद्र
में हैं |
टीपू
"सुल्तान " हो
या "हैवान" ,पर अब
जमी के गर्त
में खो चूका
है |
ये तो सर्विदित
है की हर
इंसान की तरह
उसमे भी तमाम
अच्छाइयों के साथ
कुछ बुराइयां ,या
तमाम बुराइयों की
तरह कुछ अच्छाइयां
भी होंगी ,अब
उन पर हम
कैसे गौर करें
या अपनाएं उसमे मात्र हमारा दृश्टिकोण
ही जिम्मेवार है
क्योकि टीपू तो
उसका पक्ष रखने
नहीं आने वाला
|
कब्र किसी देवता
का हो या
दानव का ,खोदने
पर बदबू ही
देता है ,तो
उसे खोद
,ना सिर्फ खुद
वरन पूरे समाज
को उस बदबू
में धकेलना कहाँ
की समझदारी है
|
देवता हो या
दानव सिर्फ गुणों का या
सिर्फ अवगुणो का
भंडार नहीं होता
,सब में कुछ
ना कुछ गुण
या अवगुण जरूर
होता है ,अब
जिम्मेवारी और दृश्टिकोण
हमारा है की
हम उसके सकारात्मक
पहलुओं को देखें
,अपनाएं या फिर
उसके नकारात्मक पक्ष
पर हल्ला मचाएं
| ये तो अपना- अपना
चरित्र
है | हल्ला या
अनुकरण तो हमारा
अपना चरित्र है
इसमें बेचारे उस
"दिवंगत" का क्या
दोष |
यही हमारे संस्कार भी
हैं की जहाँ
से भी अच्छाई
मिले लेते चलें
और बुराई छोड़ते
,राम ने भी
तो लक्ष्मण को
रावण से दीक्षा
लेने कहा था
ना ,और हाँ
इस बाजारीकृत वैश्विक और
आधुनिक समाज की
मांग भी यही
है की हम
किसी "ताबूत " ,मकबरे या
कब्र को चमका
कर ,पालिश कर
,उसके चारों ओर
पार्क लगा ,खूबसूरती
और आय को
बढ़ाएं और विरासत
को भी सहेजें
|
वैसे हल्ला हो या
ना हो अब
तक तो आम
आदमी "टीपू " को उसकी
वीरता ,आधुनिक सोच और
उच्च आदर्शों के
लिए ही जानता
आया है ,भले
(कुछ दस्तावेज आज
) उसे इतिहास की
"कालिख" कहने में
लगे हों |
खैर ,जो भी
हो ,आप किताबें
बदल दो , आने
वाले पीढ़ी की
सोच बदल दो
, पर वर्तमान पीढ़ी
तो उसे " सकारात्मक
" ,रूप में ही
देखती रहेगी और
देखना चाहिए भी
, वो इसलिए नहीं
की वो एक
महान इंसान था
बल्कि इसलिए की
हमें एक मनुष्य
,एक नागरिक और
एक उपभोक्ता के
रूप में मात्र
सकारात्मकता को बढ़ावा
देना चाहिए ना
की काल के
गर्त में छुपे
नकारात्मकता को चंद
ऐतिहासिक सबूत रुपी
"फावड़े " से खोदना
चाहिए | इससे मात्र
दुर्गन्ध और असहिष्णुता ही
फैलेगी |
खैर , जो भी
हो ,हल्ला ही
सही टीपू सुल्तान
की हनक जरूर
कुछ समय के
लिए लौट तो
आई जो कइयों
को प्रेरित तो
कइयों को निराश
भी करेगी |
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